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musibat jab bhi aati hai by gaytri shukla

मुसीबत जब भी आती है मुसीबत जब भी आती हैबहुत कुछ कह के जाती है । रात कितनी अंधेरी होसमय …


मुसीबत जब भी आती है

musibat jab bhi aati hai by gaytri shukla

मुसीबत जब भी आती है
बहुत कुछ कह के जाती है ।

रात कितनी अंधेरी हो
समय पर बीत ही जाती है
बात कितनी भी गहरी हो
समय पर ही समझ आती है ।

सुना है मौत भी आती है
तो दस्तक देकर आती है
मगर इन्सान को कब
इसकी आहट समझ आती है ।

संकट की घड़ी भी
यूं न एकाएक आई है ,
हम इन्सानों के कर्मों की ही
तो सजा सुना रही है ।

सुनो मौन प्रकृति का
यह चित्कार करती है
कि अब इस हाल में रहना ही
तुम इन्सानों की नियति है ।

कमाने को वो दो रोटी
होकर मजबूर निकला था
खनक पैसों की मजदूरों को
शहर तक खींच लाती है ।

शहर भी गाँव बन गया है
काम सब बंद पड़ गया है,
भूख जब कहर ढाती है
तो घर की याद आती है ।

रूठकर अपनों से जो
नई दुनिया बनाई थी,
उन्ही अपनों की दुआएं
असर तुमपर दिखाती हैं ।

दया और दान ही अब
सबसे बड़ा धर्म रह गया है
मानवता रखो जिंदा
विपत्ति आजमाती है।

वक्त कैसा भी मुश्किल हो
कि पल -पल बीत जाता है
रखो मुस्कान को जिन्दा
क्यों चेहरे पर उदासी है ।

मुसीबत जब भी आती है
बहुत कुछ कहकर जाती है ।

गायत्री शुक्ला
रायपुर (छ.ग )


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