Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem, Vinod Dubey

Munshi premchandra par kavita |प्रेमचंद

प्रेमचंद Munshi premchandra एक ख़्वाहिश है, कि कभी जो तुम एक दोस्त बनकर मिलो,तो कुल्हड़ में चाय लेकर,तुम्हारे साथ सुबह …


प्रेमचंद

Munshi premchandra
Munshi premchandra
एक ख़्वाहिश है,

कि कभी जो तुम एक दोस्त बनकर मिलो,
तो कुल्हड़ में चाय लेकर,
तुम्हारे साथ सुबह का कुछ वक़्त गुज़ारूँ,
तुमसे बातें करते शायद देख पाऊँ ,
तुम्हारी आँखों में छुपे वो सारे राज़ ,
जो लाख कोशिशों के बावजूद,
तुम्हारे अन्दाज़ में नहीं देख पाया 
ये तुम्हारा समाज……

मसलन, छोटे से गाँव का एक मेला,
जो बच्चों के लिए महज़ खिलौनों और मिठाईयों की दुकान में होता है सिमटा,
उसी ईदगाह के मेले में ,कैसे दिख जाता है तुम्हें, वो नन्हा सा हामिद,
अपनी बूढ़ी दादी के लिए ख़रीदता,
एक तीन आने का चिमटा…

घूसखोर नौकरशाहों के समाज में ,
जहाँ हमें अंदाज़ा भी नहीं,
कि कोई ईमानदार अफ़सर भी कहीं होगा,
कैसे मिल जाता है तुम्हें वो एक बंशीधर,
सेठ अलोपीदीन के पैसों के सामने चट्टान सा खड़ा, तुम्हारा वो नमक का दारोग़ा …..

एक समाज जहाँ,बदले की भावना का फ़ैशन हो,
लोग बेधड़क रच लेते हों ,“ जैसे को तैसे” का षड़यंत्र ,
कैसे मिल जाता है तुम्हें वो बूढ़ा बेसहारा भगत,
अपने इकलौते बेटे के हत्यारे के बेटे में,
जो निःस्वार्थ फूँक देता है, जीवन का मंत्र…

एक समाज जहाँ,
माँ बच्चे की ऊँगली पकड़कर सिखाती हो गिरना और संभलना,
तुम्हें कैसे दिख जाती है वो बूढ़ी काकी,
और उसका बचे-खुचे खाने में पूड़ी-जलेबी के टुकड़े तलाशना …..

एक समाज जहाँ, ग़रीबी के क़िस्से आम से लगते हों,
मन में क्यूँ चिपकी रह जाती है, सिर्फ़ तुम्हारी लिखी हर बात,
कफ़न के पैसे से शराब पीते आज भी नज़र आते हैं कहीं घीसू और माधव,
तो किसी खेत में पड़ा कोई हलकू ,ठंड में आज भी गुज़ार लेता है पूस की एक रात….

जिस देश में उसका राजा सबको,
सिर्फ़ हिंदू या मुसलमान दिखायी देता है,
ना क़ायदे से कोई परीक्षा होती है ,
ना परीक्षकों में सुजान सिंह जैसा कोई वफ़ादार दीवान दिखायी देता है,
उसी देश में कैसे मिल जाते हैं तुम्हें,
अलगू चौधरी और ज़ुम्मन मियाँ
कैसे समझ लेते हो तुम,
कि इंसान जब पंच बनता है,
तो सिर्फ़ इंसान नहीं रह जाता,
वो परमेश्वर बन जाता है,
सिर्फ़ हिंदू या मुसलमान नहीं रह जाता….

चाय की आख़िरी चुस्की से पहले,
ये सब मुझे पूछना है तुमसे,
और फिर जाने से पहले तुम्हें ग़ौर से देखना है ,
देखना चाहूँगा,
बिना धनपत राय के धन के ,
बिना नवाब राय की नवाबी के ,
कैसी थी तुम्हारी तक़दीर,
एक फटा हुआ जूता,
और मटमैले कुर्ते में लिपटा ,
कैसा था तुम्हारा वो दुबला शरीर,
जिसने महज़ छप्पन सालों में तैयार कर दी ,
कहानी, नाटक और उपन्यासों की,
इतनी बड़ी जागीर ..,.

जब हास्य लिखा , तो हँसा दिया,
जब दर्द लिखा , तो रुला दिया,
सिर्फ़ एक फ़िल्म लिखी, सोज़े वतन,
उस पर भी दंगा करा दिया,
इतनी अलग विधाओं में,
इतना कुछ कैसे लिख पाए ,
प्रेम और कल्पना में लिपटे साहित्य को,
वास्तविकता की धूप में कैसे खींच लाए,
और आख़िर में ,
छूना चाहूँगा एकबार तुम्हारी दवात में रखी ,
भावनाओं की वो जादुई स्याही,
नमन है तुम्हें मुंशी प्रेमचंद्र,
तुम्हीं हो सही मायने में ,
कलम के सिपाही …..

About author

vinod dubey
Author-Vinod Dubey
भदोही जिले के एक गावँ में जन्मे विनोद दूबे, पेशे से जहाज़ी और दिल से लेखक हैं |
गदहिया गोल (आजकल का KG ) से १२वीं तक की पढ़ाई हिंदी मीडियम स्कूल से करने के
बाद मर्चेंट नेवी के पैसों की खुशबू इन्हे समुन्दर में कुदा गयी।
पेशेवर क्षेत्र :
आईआईटी – जेईई की रैंक के ज़रिये इन्हे भारत सरकार के इकलौते प्रशिक्षण पोत "टी. एस.
चाणक्य" से मर्चेंट नेवी की ट्रेनिंग पूरी करने का अवसर मिला। ट्रेनिंग में " ऑल राउंड बेस्ट
कैडेट" का खिताब मिला और नॉटिकल साइंस में स्नातक की डिग्री मिली। उसके बाद जहाज
की नौकरी में ये एक्सोनमोबिल जैसी फार्च्यून ५०० में स्थान प्राप्त मल्टीनेशनल कंपनियों में
काम करते रहे। कैडेट से कैप्टेन बनने तक के १२ सालों के ख़ानाबदोश जहाजी सफर ( सभी
महाद्वीपों में भ्रमण) ने इनके अनुभव के दायरे को विदेशों तक खींचा । कैप्टेन बनने के बाद ये
फिलहाल सिंगापुर की एक शिपिंग कंपनी में प्रबंधक के पद पर नियुक्त हैं और इनका
पारिवारिक घोंसला भी सिंगापुर की डाल पर है । सिंगापुर में रहते इन्होने कार्डिफ
मेट्रोपोलिटन यूनिवर्सिटी ( यू.के. ) से MBA में गोल्ड मैडल हासिल किया और इंस्टिट्यूट
ऑफ़ चार्टर्ड शिपब्रोकर की मेम्बरशिप भी हासिल की। पढ़ाई -लिखाई का सिलसिला जारी
है।
लेखकीय क्षेत्र :
पहला हिंदी उपन्यास इंडियापा हिन्दयुग्म (ब्लू) द्वारा प्रकशित हुआ। उपन्यास “इंडियापा
पाठकों में विशेष चर्चित रहा और अमेज़न पर कई दिनों तक बेस्ट सेलर बना रहा। इसकी
सफलता से प्रभावित हिन्दयुग्म प्रकाशन ने अगले संस्करण में इसे हिन्दयुग्म (ब्लू) से
हिन्दयुग्म (रेड) में तब्दील किया। ऑडिबल पर इंडियापा का ऑडियो वर्जन और इसका
अंगेज़ी अनुवाद भी आ चुका है ।
कविता लेखन और वाचन में भी इनकी रूचि है और “वीकेंड वाली कविता” नामक यूटूब
चैनल इनके कविताओं की गुल्लक है। वीकेंड वाली कविता और जहाज़ी फ्लाईड्रीम प्रकाशन
के जरिये किताब की शक्ल में भी लोगों तक पहुँच चुकी है । इस किताब को भारत और
सिंगापुर में काफी पसंद किया जा रहा है।
लेखकीय उपलब्धियां :
 सिंगापुर में हिंदी के योगदान को लेकर HEP ( highly enriched personality)
का पुरस्कार
 कविता के लिये सिंगापुर भारतीय उच्चायोग द्वारा पुरस्कृत किया गया है।
 संगम सिंगापुर पत्रिका के हर अंक में कवितायेँ और यात्रा वृत्तांत छपते हैं।
 देश विदेश के लगभग १०० से अधिक कवि सम्मेलनों में हिस्सा लिया, जिसमे अशोक
चक्रधर, लाक्षिकान्त वाजपेयी, इत्यादि मानिंद शामिल रहे ।
 अनेक संस्थाओं से जुड़ाव और कवितायेँ प्रस्तुत की : सिंगापुर ( संगम, कविताई ) ,
नेदरलॅंड्स ( साँझा संसार ) , यू. के. ( वातायन )
 नेदरलॅंड्स की प्रवासी पत्रिका में यात्रा वृत्तांत छप चुका है।
 मीराबाई चानू पर इनकी लिखी कविता इंडियन हाई कमीशन

Related Posts

Bapu aur lal by Dr. indu kumari

October 7, 2021

  शीर्षक-बापू और लाल आज ही इस धर -धामपर  दो विभूतियों ने ले अवतार  दो अक्टूबर को कर सार्थक  राष्ट्र

Mom si nari by Anita Sharma

October 7, 2021

 “मोम सी नारी” बाहर से सख्त अन्दर से नर्म है। भावनाओं में बह सर्वस्व लुटा देती। हाँ अधिकतर छल से

Badduaon ke bhagidar by Jitendra Kabir

October 7, 2021

 बद्दुआओं के भागीदार दूसरों की नहीं कह सकता लेकिन अपने घर में मां ,बहन, बेटी और भी कई सारी महिलाओं

Bharosa khud ka by Dr. indu kumari

October 7, 2021

 भरोसा खुद का तुझमें बहुत सी ताकत है जीवन से लड़ना सीखो आती है ढेर समस्या पर निपटना भी विवेक

Khudgarji by Anita Sharma

October 7, 2021

 विषय-खुदगर्जी  खुदगर्ज कौन नहीं इस संसार में। अपनो का साथ पाने की तमन्ना हर इन्सान में। अपनापन अपना परिवार सर्वोपरि

Jivan ko jeena by Anita Sharma

October 7, 2021

 “जीवन को जीना “ जीवन ने सिखलाया है, जीवन को जीना है कैसे? सुख के पीछे भागोगे तो, दुख चिंता

Leave a Comment