Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Anishk, poem

Jeevan ki pagdandi par by anishk

जीवन की पगडंडी पर जीवन की पगडंडी पर जीवन की पगडंडी परचलते-चलते जब शाम हुई,पैरों में तिनके लिपटे सेनींदें रातों …


जीवन की पगडंडी पर

Jeevan ki pagdandi par by anishk
जीवन की पगडंडी पर

जीवन की पगडंडी पर
चलते-चलते जब शाम हुई,
पैरों में तिनके लिपटे से
नींदें रातों के नाम हुई,
जब भोर गयी उठकर देखा
दिनकर सर पर चढ़ कर बैठा
तब मैंने अपने स्वपनों को
आतप में क्षन-क्षन मरते देखा,
पुनः रात्रि के आँगन में
अभिलाषाएँ अविराम हुईं
जीवन की पगडंडी पर
चलते चलते जब शाम हुई..।।

                   
               — ©अनिष्क 

Related Posts

नफरत की आग

June 24, 2022

 नफरत की आग जितेन्द्र ‘कबीर’ आग! आग से बुझती नहीं कभी, बुझती है रेत या फिर पानी से, नफरत की

ईश्वर क्या है?

June 24, 2022

 ईश्वर क्या है? जितेन्द्र ‘कबीर’ एक उम्मीद है! कुछ अच्छा होने की, अपने जीवन में कठिनाइयों से जूझते इंसान के

ऐसे बदलाव नहीं आएंगे

June 24, 2022

 ऐसे बदलाव नहीं आएंगे जितेन्द्र ‘कबीर’ सिर्फ इसलिए कि हमें बुरा लगता है देखना… देश को दंगे-फसादों में जलते हुए,

कोई क्या कर पाएगा?

June 24, 2022

 कोई क्या कर पाएगा? जितेन्द्र ‘कबीर’ बहुत मेधावी होगा अगर किसी का बच्चा तो डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासनिक अधिकारी, खिलाड़ी या

दुनियादारी

June 24, 2022

 दुनियादारी जितेन्द्र ‘कबीर’ बड़े खुश थे सभी चुप रहा करते थे जब तक, जरा सी जुबान जो खोली तो शिकवे

लूट मची है लूट

June 24, 2022

 लूट मची है लूट जितेन्द्र ‘कबीर’ शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में जो छोटे-बड़े ‘कुकुरमुत्ते’ उग आए हैं अवसर पाकर,

PreviousNext

Leave a Comment