ग़ज़ल
आजकल शहर में एक फ़साना सरे आम हो गया,
जब से यार मेरा सियासी लोगो का गुलाम हो गया
जमीर बेच दिया उसने थोड़ी सी दौलत की खातिर,
यह क्या हो रहा आज ज़माने में अख़बार बोलता
इक ईमानदार अफसर परेशान है घर चलाने में
सियासत की गणित मानवता ख़त्म कर रही अब,
ग़ज़ल आजकल शहर में एक फ़साना सरे आम हो गया, जब से यार मेरा सियासी लोगो का गुलाम हो गया …
आजकल शहर में एक फ़साना सरे आम हो गया,
जब से यार मेरा सियासी लोगो का गुलाम हो गया
July 3, 2021
थोड़ा सा चिंतन बहुत बातें हो गई हों अगर पैट्रोल के दाम पैंतीस रुपए पर लाने की, तो थोड़ा सा
July 3, 2021
कोई आश्चर्य नहीं है मौका मिलने पर हममें से ज्यादातर लोग हो सकते हैं ठग, चोर, झूठे और बेईमान, तो
July 3, 2021
.कविता-ऐसे अपराध से हम बचते हैं हम इंसानों ने मंदिर बनाने में पैसा लगाया हम इंसानों ने मस्जिद बनाने में
July 3, 2021
ग़ज़ल ️ लिक्खा या बिन लिक्खा पढ़नाजो भी पढ़ना अच्छा पढ़ना ग़र मंज़िल तक जाना है तोसबसे पहले रस्ता पढ़ना
July 3, 2021
यादें यादों को दिल में बसाए रखना,दिल के करीने में सजाए रखना.यादें बड़ी अनमोल हुआ करती हैं,हीरे-मोती हैं इसको बचाए
July 3, 2021
ग़ज़ल तुलसी तुलसी,पीपल तेरे आँगन में लगाना है मुझे ।अबकी इस तरहा मुहब्बत को निभाना है मुझे।। अब न आँखों