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सुख-सुविधा का पागलपन रौंद रहा मनुष्यता

सुख-सुविधा का पागलपन रौंद रहा मनुष्यता आज के भागदौड़ भरे जीवन में अच्छे जीवन की एक संकीर्ण धारणा पर ध्यान …


सुख-सुविधा का पागलपन रौंद रहा मनुष्यता

सुख-सुविधा का पागलपन रौंद रहा मनुष्यता

आज के भागदौड़ भरे जीवन में अच्छे जीवन की एक संकीर्ण धारणा पर ध्यान केंद्रित करने से विभिन्न नैतिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है। नैतिक मूल्यों के संकट का समाधान करने के लिए अच्छे जीवन की समग्र दृष्टि को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। जीवन का सही अर्थ खोजने के लिए, बुद्ध ने अपना घर और धन छोड़ दिया। राजा हरिश्चंद्र, महात्मा गांधी और डॉ. कलाम के जीवन से कोई भी व्यक्ति सच्चाई, धार्मिकता, ईमानदारी और करुणा के मूल्यों को सीख सकता है। नैतिक मूल्यों के व्यापक आयामों पर जोर देने से, विशेष रूप से व्यक्तियों और समग्र रूप से समाज के दीर्घकालिक कल्याण को सुनिश्चित किया जा सकता है।

डॉ सत्यवान सौरभ

 नैतिक मूल्य एक व्यक्ति के भीतर स्थायी विश्वास और विचार हैं और अच्छे या बुरे के लिए प्राथमिकता को दर्शाते हैं। आधुनिक समय में कई समाजों ने मानव जीवन के प्राथमिक लक्ष्य के रूप में भौतिक संपदा, शक्ति और स्थिति के संचय पर तेजी से ध्यान केंद्रित किया है। इसने एक अच्छे जीवन की एक संकीर्ण परिभाषा को जन्म दिया है, जहाँ सफलता को दूसरों की कीमत पर अक्सर भौतिक संपत्ति जमा करने की क्षमता से मापा जाता है। अच्छे जीवन की एक संकीर्ण धारणा, नैतिक मूल्यों के संकट की ओर ले जा रही है। जैसे भ्रष्टाचार का मुद्दा अच्छे जीवन की संकीर्ण धारणा से पारदर्शिता, सत्यनिष्ठा, सामाजिक उत्तरदायित्व और ईमानदारी जैसे मूल्यों का ह्रास होता है। इससे जनहित के स्थान पर निजी स्वार्थों को बढ़ावा मिला है। जलवायु परिवर्तन वर्षों से कभी न खत्म होने वाली मानव मांगों की पूर्ति ने ग्रह के संसाधनों पर जबरदस्त दबाव डाला है। ग्रह एक अभूतपूर्व दर से गर्म हो रहा है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं, और वन्य जीवन गायब हो रहा है। ये सभी आपदाएं अति-भौतिकवाद की आसक्ति से उत्पन्न हुई हैं।

उदाहरण के लिए, जोशीमठ में संकट पारिस्थितिकी या पारिस्थितिकी तंत्र पर अर्थशास्त्र को चुनने का परिणाम है। अक्सर यह कहा जाता है कि “असीमित शक्ति उन लोगों के दिमाग को भ्रष्ट करने के लिए उपयुक्त होती है जिनके पास यह होता है”। एक हालिया उदाहरण एक सिविल सेवक का है, जिसने खेल स्टेडियम को कुत्तों के टहलाने के लिए खाली करा दिया और वहाँ से एथलीटों को जाने के लिए कहा गया। आज किसी से यह पूछा जाए कि आपका लक्ष्य क्या है तो वह यही कहता है कि पैसा। उसको पाने के लिए कुछ भी कर गुजरने की ललक उनमें है। चाहे वह गलत रास्ते अपनाकर ही क्यों न पूरी करनी पड़े। न जाने कितने ही ऐसे उदाहरण देखने को मिल जाएंगे जो यह दर्शाते हैं कि युवा वर्ग खुद में नैतिक मूल्यों को कितना गिरा चुके हैं। दुख तो इस बात पर होता है कि शिष्टाचार, संस्कार व नैतिकता की उन्हें पहचान ही नहीं और न ही वह इसको मानने को तैयार हैं। आज की युवा पीढ़ी तो पागल हाथी की तरह नैतिकता व संस्कारों को भुलाकर अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को रौंदते हुए चली जा रही है। वह इस बात से बेखबर हैं कि जब भी जमीन पर गिरेंगे तो क्या हाल होगा। यह सिर्फ नैतिक मूल्यों की कमी के कारण ही हो रहा है।

जिस महान धरा पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम व अर्जुन जैसे महान विभूतियों का जन्म हुआ है। आज उसी धरा से शिष्टाचार, नैतिकता व संस्कार खोते जा रहे हैं। संस्कार हमें सफलता की ऊंचाइयों तक ले जाते हैं। जब हम अपने आदर्श, संस्कार व उद्देश्य भूल जाते हैं तो असफलताएं ही हाथ लगती हैं। कड़वा सच यह है कि आज के युवाओं को संस्कार, आदर्श व सिद्धांत का पता ही नहीं है। अगर ईमानदारी से सोचें तो अनैतिकता व अशिष्टता को फैलाने वाले कोई और नहीं अपितु हम ही हैं। उनको सहेजने के लिए भी हमें ही कदम उठाने होंगे। अपने बच्चों को अच्छे संस्कार व शिक्षा दें। बच्चा कोरे कागज की तरह होता है उस कोरे कागज पर संस्कारों, नैतिक मूल्यों व शिष्टाचार की तहरीर लिखना हमारा फर्ज है। अभी तक भी समय है और आज से ही हमें शपथ लेनी होगी कि युवाओं पर दोष मढ़ने के बजाय बच्चों को संस्कार, नैतिक मूल्य व शिष्टाचार को सिखाएं। साधन के बजाय साध्य पर ध्यान देने से आज धन, आधुनिक विलासिता और कामुक सुख पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।

 इन साधनों को प्राप्त करने के लिए यथोचित माध्यम को महत्व नहीं दिया जाता है, जिससे नैतिक मूल्यों की उपेक्षा की जाती है। इससे क्रोनी कैपिटलिज्म, घोटाले, अपराध और समाज में बढ़ती असमानता बढ़ती है। गांधीवादी सिद्धांतों के खिलाफ होने से अच्छे जीवन की संकीर्ण धारणा, गांधीवादी 7 सामाजिक पापों की ओर ले जा रही है, जो समाज को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। उदाहरण के लिए, काला धन और कर चोरी- ‘बिना काम के धन’ का परिणाम है, इसी प्रकार हिरोशिमा और नागासाकी में बमबारी- ‘मानवता के बिना विज्ञान’ को दर्शाता है। असंतोष, अलगाव, उपद्रव, आंदोलन, असमानता, असामंजस्य, अराजकता, आदर्श विहीनता, अन्याय, अत्याचार, अपमान, असफलता अवसाद, अस्थिरता, अनिश्चितता, संघर्ष, हिंसा… यही सब घेरे हुए है, आज हमारे जीवन को। व्यक्ति में एवं समाज में साम्प्रदायिकता, जातीयता, भाषावाद, क्षेत्रीयतावाद, हिंसा की संकीर्ण कुत्सित भावनाओं व समस्याओं के मूल में उत्तरदायी कारण है।

यदि बच्चों के परिवेश में नैतिकता के तत्व पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं तो परिवेश में जिन तत्वों की प्रधानता होगी वे जीवन का अंश बन जायेंगे।इसीलिए कहा जाता है कि मूल्य पढ़ने नहीं जाते, अधिग्रहित किये जाते हैं। नैतिक मूल्यों के संकट का समाधान करने के लिए अच्छे जीवन की समग्र दृष्टि को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। जीवन का सही अर्थ खोजने के लिए, बुद्ध ने अपना घर और धन छोड़ दिया। राजा हरिश्चंद्र, महात्मा गांधी और डॉ. कलाम के जीवन से कोई भी व्यक्ति सच्चाई, धार्मिकता, ईमानदारी और करुणा के मूल्यों को सीख सकता है। नैतिक मूल्यों के व्यापक आयामों पर जोर देने से, विशेष रूप से व्यक्तियों और समग्र रूप से समाज के दीर्घकालिक कल्याण को सुनिश्चित किया जा सकता है।

About author


डॉo सत्यवान ‘सौरभ’
कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,
333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा – 127045
facebook – https://www.facebook.com/saty.verma333
twitter- https://twitter.com/SatyawanSaurabh


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