Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem, sudhir_srivastava

व्यंग्य स्वार्थ के घोड़े

 व्यंग्यस्वार्थ के घोड़े सुधीर श्रीवास्तव आजकल का यही जमाना अंधे को दर्पण दिखलाना, बेंच देते गंजे को कंघा देखो! कैसा …


 व्यंग्य
स्वार्थ के घोड़े

सुधीर श्रीवास्तव
सुधीर श्रीवास्तव

आजकल का यही जमाना

अंधे को दर्पण दिखलाना,

बेंच देते गंजे को कंघा

देखो! कैसा आ गया जमाना।

लंगड़े दौड़ लगाते दिखते

अंधे हमको राह दिखाते,

लूले हैं खैरात बांटते।

चोर उचक्के नेता बनकर

शहर शहर सरकार चलाते।

उल्टा पुल्टा हो गया सब

नहीं किसी की बात मानते,

अजब गजब दुनिया की माया

भगवान भी हैं अब माथ पीटते।

कैसा गजब जमाना यारों

रिश्वत से भगवान पटाते,

दारु के अड्डे पर जाकर

धूप दीप नैवेद्य चढ़ाते।

अंधेरे में अंधो को अब 

आँखों वाले दर्पण दिखलाते,

स्वार्थ के घोड़े पर चढ़कर

नये नये आइना मंगाते,

जिसे जरुरत नहीं है यारों

उन्हें ही वो आइना दिखाते। 

सुधीर श्रीवास्तव

गोण्डा उत्तर प्रदेश

८११५२८५९२१

© मौलिक, स्वरचित

०५.०५.२०२२


Related Posts

वीणा के सुर खामोश हो रहे

April 27, 2022

 वीणा के सुर खामोश हो रहे मेरी तमन्नाओं के कातिल बता तूने हमें वफा क्यों न दी।। कभी मांगा न

मेरे घर कि चौखट आज भी खुली

April 27, 2022

 मेरे घर कि चौखट आज भी खुली कभी तो तुम्हें भी मेरी याद आती ही होगी कभी तो मेरी याद

देखो हर शब्द में रब

April 27, 2022

 देखो हर शब्द में रब दिल को जीत लेते शब्द दिल को भेद भी देते शब्द दिल को बहलता मिठास

काट दिए मेरी कलम के पर

April 27, 2022

 काट दिए मेरी कलम के पर तमन्ना थी कभी खुद को , मैं खूब संवारूंगीसौलह श्रंगार करके , मैं खुद

मोहब्बत ए परवाना

April 27, 2022

मोहब्बत ए परवाना कहते हैं वो मोहब्बत ए परवाने , इस अंजुमन में रखा क्या हैतेरे हुस्न दीदार के बिना

गम की बदली

April 25, 2022

 ‘गम की बदली’ मैं गमों से भरी सराबोर बदली हूँ बरसना मेरी फ़ितरत है, यूँ तरस खाकर पौंछिए नहीं रहने

PreviousNext

Leave a Comment