Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

kishan bhavnani, poem, vyang

व्यंग्य कविता–मैं भ्रष्टाचारी कहलाता हूं| Mai bhrastachari kehlata hun

 यह  कविता भ्रष्टाचार पर व्यंग्यात्मक कुटिल कटाक्ष है।जिसका परिणाम बच्चों बीवी मां सहित परिवार की बीमारी से निकलता है।जिसका संज्ञान …


 यह  कविता भ्रष्टाचार पर व्यंग्यात्मक कुटिल कटाक्ष है।जिसका परिणाम बच्चों बीवी मां सहित परिवार की बीमारी से निकलता है।जिसका संज्ञान लेकर आधारित है।

व्यंग्य कविता–मैं भ्रष्टाचारी कहलाता हूं

अपने बच्चों को महंगे स्कूल में पढ़वाता हूं
हरदम ऐश ऐयाशी का जीवन जीता हूं
मासिक वेतन सिर्फ दस हज़ार पाता हूं
इसलिए मैं भ्रष्टाचारी कहलाता हूं

जनता को बहुत चकरे खिलाता हूं
घुमाकर हरे गुलाबी बहुत सारे लेता हूं
आलीशान बिल्डिंग फ्लैट प्लाट का मालिक हूं
मैं भ्रष्टाचारी कहलाता हूं

मेरा वेतन केवल दिखाने का काम है
ऊपर से लाखों की गिफ्टें कैश लेता हूं
उल्टे सीधे तिकड़म से शासनको चूना लगाता हूं
मैं भ्रष्टाचारी कहलाता हूं

पास पड़ोसवाले समझगए हैं काली कमाई लाताहूं
पैसों के बल पर सम्मान इज्जत पाता हूं
पावर का गलत इस्तेमाल करता हूं
मैं भ्रष्टाचारी कहलाता हूं

फलमिला बच्चे बीवी बीमार हुई पछताता हूं
परिवार के रग-रग में भ्रष्टाचारी ख़ूनहै समझताहूं
भ्रष्टाचार से अब कान पकड़कर तौबा किया हूं
फ़िर भी मैं भ्रष्टाचारी कहलाता हूं

About author

Kishan sanmukh

-संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र


Related Posts

sukoon-aye talash by mamta kushvaha

July 3, 2021

सुकून -ऐ-तालाश सुकून -ऐ-तालाश सबको है इस जहां में ,हर एक इंसान परेशान है खुद में बस कोई जाहिर कर

kavita mera bharat by madhu pradhan

July 3, 2021

मेरा भारत मेरा प्यारा सबसे न्यारा भारत देशकल- कल करके नदिया बहती झर-झर करके झरने बहते आँखों में बसते दृश्य

kavita vriddho ka samman by madhu pradhan

July 3, 2021

वृद्धों का सम्मान मीठी वाणी बोलकर वृद्धन का सम्मान करो नाज करो संस्कारन पे मत इनका उपहास करो एक दिन

dharti saja den by dr indu kumari

June 27, 2021

 धरती सजा दें  आएं हम सब मिलकर  धरती को यूं सजा दें।  पेड़ों की कतारें लगा दें  इस अवनि को

geet sawan barse sakhi by dr indu kumari

June 27, 2021

गीत – सावन बरसे सखी  बरसे रे सखी रिमझिम पनिया  चमकै रे सखी मेघ में बिजुरिया।  छमकत रे सखी गांव

kavita Mukti by virendra pradhan

June 27, 2021

 मुक्ति किसी डांट-डपट से बेपरवाह हो मन चाहता है खेलना मनमफिक़ खेल जो बन्धे न हों बहुत अनुशासन मेँ परे

Leave a Comment