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वन्य जीवों और पेड़ों के लिए अपनी जान पर खेलता बिश्नोई समाज

 वन्य जीवों और पेड़ों के लिए अपनी जान पर खेलता बिश्नोई समाज सत्यवान ‘सौरभ’,  (राजस्थान के बिश्नोई समाज की महिलाएं …


 वन्य जीवों और पेड़ों के लिए अपनी जान पर खेलता बिश्नोई समाज

सत्यवान 'सौरभ',
सत्यवान ‘सौरभ’, 

(राजस्थान के बिश्नोई समाज की महिलाएं हिरण के बच्चों को बिल्कुल मां की तरह पालती है, यहां तक की उन्हें अपना दूध भी पिलाती है। बिश्नोई समाज ने पर्यावरण संरक्षण की स्मृतियों पर एक अमिट छाप छोड़ी है और लोगों के मानस पर दीर्घकालिक प्रभाव डाला है। )

                                            -सत्यवान ‘सौरभ’

बिश्नोई आंदोलन पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीव संरक्षण और हरित जीवन के पहले संगठित समर्थकों में से एक है। बिश्नोइयों को भारत का पहला पर्यावरणविद माना जाता है। ये जन्मजात प्रकृति प्रेमी होते हैं। पर्यावरण आंदोलनों के इतिहास में, यह वह आंदोलन था जिसने पहली बार पेड़ों को अपनी सुरक्षा के लिए गले लगाने और गले लगाने की रणनीति का इस्तेमाल किया। बिश्नोई समाज के लिए हिरण का मतलब भगवान है। बिश्नोई समाज के लिए हिरण भगवान श्रीकृष्ण के अवतार की तरह हैं वो उनको पूजते हैं। साथ ही बिश्नोई समाज की महिलाएं हिरण के बच्चों को अपने बच्चों की तरह स्तनपान करवाती हैं। इसी तरह बिश्नोई समाज पेड़ों के लिए प्रतिबद्ध रहता है। वो कहते हैं हम पेड़ और जीव-जन्तुओं के लिए जान तक दे सकते हैं।

मां हमेशा अपने बच्चों का ख्याल रखती है और उनकी हर जरूरतों को पूरा करने में अपनी जान लगा देती है। आज हम आपको ऐसी माओं के बारे में बताने जा रहे हैं जो हिरण को बिल्कुल अपने बच्चे की तरह पालती हैं और बचपन से लेकर बड़े होने तक उनकी हर छोटी-बड़ी बात का ध्यान रखती है। सुनने में ये आपको अजीब-सा लगेगा पर ये बिल्कुल सच है। राजस्थान के बिश्नोई समाज की महिलाएं हिरण के बच्चों को बिल्कुल मां की तरह पालती है, यहां तक की उन्हें अपना दूध भी पिलाती है। उल्लेखनीय है कि राजस्थान में करीब 500 साल से प्रथा चली आ रही है जहां महिलाएं बिल्कुल बच्चों की तरह जानवरों को पालती हैं।

बिश्नोई समाज की महिलाएं जानवरों को अपने बच्चों की तरह पालती हैं, उनकी देखभाल करती हैं यहां तक की अपना दूध भी पिलाती हैं। न सिर्फ महिलाएं बल्कि, इस समाज के पुरुष भी लावारिस और अनाथ हो चुके हिरण के बच्चों को अपने घरों में परिवार की तरह पालते हैं। इस समाज की महिलाएं खुद को हिरण के इन बच्चों की मां कहती हैं। बिश्नोई समाज को अपना नाम भगवान विष्णु के नाम से मिला है। बिश्नोई समाज के लोग पर्यावरण को पूजते हैं। बिश्नोई समाज के लोग ज्यादातर जंगल और थार रेगिस्तान के समीप रहते हैं। इस समाज के बच्चे जानवरों के साथ खेल-कूद कर बड़े होते हैं।बिश्नोई समाज के लोग हिंदू गुरु श्री जम्भेश्वर भगवान को मानते हैं जो कि बीकानेर से थे। इस समाज के लोग अपने बनाए नियमों का सख्ती से पालन करते हैं।

बिश्नोई अथवा विश्नोई उत्तर पश्चिमी भारत के पश्चिमी राजस्थान की एक पर्यावरण प्रेमी पंथ(संप्रदाय) है। इस पंथ के संस्थापक जाम्भोजी महाराज है। जाम्भोजी महाराज द्वारा बताये 29 नियमों का पालन करने वाला बिश्नोई है। “बिश्नोई” शब्द की उत्पति 20(बीस)+9(नौ) = बिश्नोई से हुई है। कई मान्यताओं के अनुसार श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान विष्णु के अवतार माने गए है इनसे बना ‘विष्णोई’ शब्द कालातंर में परिवर्तित होकर विश्नोई या बिश्नोई हो गया। बिश्नोई विशुद्ध शाकाहारी होते हैं। बिश्नोई एक जाति हैं जो विशुद्ध शाकाहारी हैं वन एवं वन्यजीवों पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली हैं। बिश्नोई समाज के लोग ज्यादातर किसान खेती पशुपालन करते हैं। बड़े मेहनती एवं निडर साहसी बहादुर होते हैं।

प्रसिद्ध अमृता देवी का आंदोलन पर्यावरण संरक्षण के अग्रणी प्रयासों में से एक माना जाता है। खेजड़ी के हरे वृक्षों की रक्षा करने के लिए अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 बिश्नोईयों ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे। जोधपुर के राजा अभय सिंह ने 1730 के दशक में अपना नया महल बनवाते समय अपने सैनिकों को खेजड़ली गांव में लकड़ी के लिए पेड़ों को काटने का आदेश दिया। विरोध के प्रतीक के रूप में अमृता देवी सैनिकों के खिलाफ खड़ी हो गईं और पेड़ों से लिपटकर उनके जीवन के लिए संघर्ष किया। उनकी तीन बेटियाँ, आसु, रत्नी और भागू भी अपनी माँ के साथ खड़ी थीं। उनका समर्थन करते हुए, इस समुदाय के अन्य लोग भी पेड़ों के लिए खड़े हो गए और अपनी बाहों को ट्रंक के चारों ओर लपेट लिया। सैनिकों ने लोगों के अनुरोधों पर ध्यान दिए बिना पेड़ों को काटना जारी रखा। पेड़ों की कटाई का विरोध करने का मुख्य कारण बिश्नोई समुदाय की सांस्कृतिक मान्यता में निहित था जैसा कि उनके संप्रदाय के सिद्धांतों में वर्णित है, पेड़ों की सुरक्षा और वन्यजीव संरक्षण की वकालत करते हैं।

एक अन्य कारण तुरंत उनकी ग्रामीण आजीविका से संबंधित था, क्योंकि वे ईंधन की लकड़ी और चारे की आपूर्ति के लिए जंगल पर निर्भर थे। खेजड़ली और अन्य गांवों के बिश्नोई इस आंदोलन में शामिल होने आए और खेजड़ी के पेड़ों को अपने सिर की कीमत पर काटे जाने से बचाने के लिए खेजड़ी के पेड़ों को गले लगाया। इस आंदोलन में 363 बिश्नोइयों ने राजस्थान के खेजड़ली गांव में खेजड़ी के पेड़ों की सुरक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। इस आंदोलन ने स्मृतियों पर एक अमिट छाप छोड़ी है और लोगों के मानस पर दीर्घकालिक प्रभाव डाला है। इस घटना के बाद, महाराजा ने सभी बिश्नोई गांवों में पेड़ों की कटाई को रोकने के लिए एक मजबूत शाही फरमान दिया। ट्री-हगिंग और ट्री हगर्स की अवधारणा की जड़ें बिश्नोवाद के इतिहास में 1730 ईस्वी सन् में हैं।

इस आंदोलन और बलिदान ने न केवल 20 वीं शताब्दी में चिपको आंदोलन को प्रेरित किया, जिसका नेतृत्व सुंदर लाल बहुगुणा ने किया था, बल्कि भारत सरकार को “अमृता देवी बिश्नोई वन्यजीव संरक्षण पुरस्कार” और राजस्थान सरकार के रूप में “अमृता” के रूप में भी प्रेरित किया। बिश्नोई समाज की पर्यावरण संरक्षण और वन एवं वन्य जीव संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका है। इनके द्वारा प्रकृति और वन्य जीवों को बचाने के लिए संघर्ष के कई उदाहरण मिलते हैं और इन्होने अखिल भारतीय जीव रक्षा बिश्नोई महासभा की स्थापना की है। वन वन्य जीवों के संरक्षण के लिए बिश्नोई टाईगर फोर्स संस्था बनाईं गई हैं जो चौबिसों घंटे वन्यजीवों की शिकार कि घटनाओं के विरूद्ध कार्यवाही करती हैं शिकारियों को घटनास्थल से पकड़ने वन्य विभाग पुलिस के सुपुर्द करने के अलावा कोर्ट में शिकारियों के विरुद्ध पैरवी करती हैं। 

— सत्यवान ‘सौरभ’, 

रिसर्च स्कॉलर, कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा – 127045

facebook – https://www.facebook.com/saty.verma333

twitter- https://twitter.com/SatyawanSaurabh


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