राजनीति भी अजीब है- सिद्धार्थ गोरखपुरी
राजनीति भी अजीब है कोई कह गया तो टिका रहा कोई कह के भी मुकर गया ये राजनीति भी बड़ी …
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गीत -घर साथ चले रजा है के दुआओं का असर साथ चलेके मैं जब शहर जाऊँ तो घर साथ चलेमुझे
समझो
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ग़ज़ल –समझो ख्वाहिश नहीं के मुझे कीमती असासा समझोमुक़म्मल भले न समझो मगर जरा सा समझो ये जो मैं हूँ,
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कविता–ईमानदारी से छोड़ दो भ्रष्टाचार!!! चकरे खिलाकर बदुआएं समेटी करके भ्रष्टाचार परिवार सहित सुखी रहोगे जब छोड़ोगे भ्रष्टाचार अब भी
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कविता–भारत को सोने की चिड़िया बनानां हैं भारत को सोने की चिड़िया बनानां हैंभ्रष्टाचार को रोककर सुशासन को आखरी छोर
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