Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

मिल मजदूर : सिनेमा का ‘प्रेम’ और साहित्य का ‘चंद’ | Mill worker: ‘Prem’ of cinema and ‘Chand’ of literature

सुपरहिट मिल मजदूर : सिनेमा का ‘प्रेम’ और साहित्य का ‘चंद’ धनपतराय श्रीवास्तव की परेशानी 8 साल की उम्र से …


सुपरहिट

मिल मजदूर : सिनेमा का ‘प्रेम’ और साहित्य का ‘चंद’

मिल मजदूर : सिनेमा का 'प्रेम' और साहित्य का 'चंद' | Mill worker: 'Prem' of cinema and 'Chand' of literature

धनपतराय श्रीवास्तव की परेशानी 8 साल की उम्र से ही शुरू हो गई थी। उन्होंने अभी स्कूल जाना शुरू किया था कि उनकी मां आनंदी देवी की बीमारी से मौत हो गई थी। उनके पिता अजब अली ने दूसरा विवाह किया और धनपत को दादी के सहारे छोड़ दिया। कुछ दिनों बाद दादी भी स्वर्ग सिधार गईं। धनपत बचपन से ही मां-बाप के प्यार से वंचित रह गया। वह 15 साल का हुआ तो उसका विवाह करा दिया गया। वह पढ़ना चाहता था, पर तभी पिता की भी मौत हो गई। इसके बाद धनपत पर सौतेले परिवार की जिम्मेदारी आ गई। सौतेली मां का अत्याचार सहन करना पड़ता था, यह एक अलग दुख था। उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी। 5 रुपए महीने वेतन पर एक ट्यूशन मिला। 3 साल बाद एक सरकारी स्कूल में सहायक शिक्षक की नौकरी मिल गई।
शिक्षक की नौकरी में प्रगति होती रही। पर घर में गुस्सैल पत्नी और सौतेली मां के साथ झगड़ों में भी ‘विकास’ होता रहा। एक बार पत्नी ने गले में फांसी भी लगा ली, पर बच गई। धनपत ने उसे इस तरह ताने मारे कि वह अपने पिता के घर चली गई। धनपत ने उसे फिर कभी नहीं बुलाया। इसके बाद धनपत ने एक बाल विधवा के साथ विवाह कर लिया। धनपत ने जिंदगी की गाड़ी को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश की। मामूली वेतन वाली शिक्षक की नौकरी करते हुए उन्होंने कालेज की पढ़ाई पूरी की, साथ ही कहानियां लिखने का शौक पूरा करने लगे। इसके बाद स्कूलों के डिप्टी इंसपेक्टर की नौकरी मिली। पर उसी बीच सरकारी नौकरियों के बहिष्कार का गांधीजी का आह्वान आया। धनपत इस तरह की नौकरियों से थक चुके थे, इसलिए पत्नी से सहमति ले कर नौकरी छोड़ दी।
धनपत ने अब लिख कर जीवन निर्वाह करने का निश्चय किया। उन्होंने बनारस में प्रिंटिंग प्रेस शुरू किया। लिख कर जब आज कमाई नहीं होती तो 40 के दशक में कैसे होती। लिख कर चार पैसे कमाने के चक्कर में धनपत मुंबई आ गए। सुना था कि मुंबई में फिल्म वाले लिखने का अच्छा पैसा देते हैं। बात तो सच थी। अजंता सिनेटोन नाम की एक फिल्म कंपनी ने 8,000 रुपए महीने वेतन पर स्क्रिप्ट लिखने की नौकरी दे दी। बनारस के पास लमही गांव में दारुण गरीबी में पैदा हुए और मामूली नौकरी के लिए कानपुर, गोरखपुर और बनारस के चक्कर लगाने वाले धनपत के लिए 8 हजार की रकम शाही थी। धनपत को सिनेमा में कोई रुचि नहीं थी, पर पैसा इतना मिल रहा था कि वह मना भी नहीं कर सकते थे। उन्होंने एक साल के एग्रीमेंट पर अजंता में नौकरी कर ली।
हैदराबाद (पाकिस्तान) के एक हिम्मती सिंधी मोहन दयाराम भवनानी ने 1933 में अजंता सिनेटोन की स्थापना की थी। 1924 में मैनचेस्टर (इंग्लैंड) जा कर मोहन ने फोटोग्राफी की टेक्नोलॉजी की पढ़ाई की थी। उसके बाद जर्मनी में फिल्में बनाना सीखा था। वहां से वापस आकर मोहन ने द्वारकादास संपत के कोहिनूर स्टूडियो के लिए ‘वीर बाला’ नाम की फिल्म का निर्देशन किया था।इस फिल्म की मार्फत उन्होंने हिंदी सिनेमा की पहली ‘सेक्स सिंबल’ सुलोचना को भेंट के रूप में दिया, जिसका असली नाम रूबी मायर्स था, जो यहूदी ऐक्ट्रेस थी। अजंता सिनेटोन के बैनर द्वारा मोहन ने धनपत को भेंट स्वरूप दिया।
31मई, 1934 को धनपत श्रीवास्तव मुंबई आए और दादर में रहने के लिए किराए पर मकान लिया। स्क्रिप्ट राइटर की नई नौकरी में उन्होंने जो पहली फिल्म लिखी, उसका नाम था ‘मिल मजदूर’। फिल्म का निर्देशन मोहन भवनानी ने किया था। इसमें मिल मालिक की बेटी पद्मा की भूमिका 30 के दशक की स्टार मिस बेबो नाम की ऐक्ट्रेस ने की थी, जबकि उसके भाई विनोद की भूमिका एस.बी.नयमपल्ली ने की थी। मिल मालिक भाई-बहन के सामने शिक्षित बेरोजगार कैलाश की भूमिका में हैंडसम हीरो पी.जयराज था।
हिंदी सिनेमा के इतिहास में ‘मिल मजदूर’ का महत्वपूर्ण स्थान है। जब यह फिल्म बनी थी, तब भारत में उद्योग के नाम पर कपड़े की मिलें खूब चल रही थीं। गरीब और अमीर की व्याख्या मिल मालिक और मिल मजदूर के रूप में होती थी। यह शहरीकरण की शुरुआत थी। क्योंकि ब्रिटिशरों ने इन्हें रहने लायक बनाया था। भारत एक गरीब देश था और गांव के लोग सुख-सुविधा की तलाश में शहरों की ओर प्रस्थान कर रहे थे। गरीबी और निरक्षरता इस कदर थी कि मिल मालिक उनका शोषण करने में पीछे नहीं रहते थे। वे मालिक और मजदूरों के संघर्ष के दिन थे। मुंबई की मिलों की इस वास्तविकता को आधार बनाकर ‘मिल मजदूर’ फिल्म बनाई गई थी। 1934 में इस तरह की फिल्म बनाना ही अपने आप में एक घटना थी। क्योंकि इसके पहले इस तरह की कोई फिल्म नहीं बनी थी। आज की भाषा में ‘मिल मजदूर’ को अर्बन नक्सलों की पहली फिल्म कह सकते हैं। फिल्म का विषय मोहन भवनानी ने पसंद किया था और धनपतराय ने उसे रुचिकर कहानी बनाई थी।
द हंसराज मिल के मालिक सेठ हंसराज मिल की मालिकी बेटे और बेटी को सौंप कर मर जाते हैं। बेटा विनोद शराबी और अय्याश है, जबकि बेटी पद्मा उदार और सेवाभावी है। मिल में काम करने वाले कर्मचारी विनोद के उलटे-सीधे आदेशों से परेशान हैं। एक दिन पद्मा की गाड़ी मिल से बाहर निकल रही थी, तभी गेट पर एक युवक बेहोश हालत में मिलता है। वह कैलाश है और नौकरी के लिए भटक रहा है।
पद्मा उसका इलाज करा कर मिल में नौकरी देती है। कैलाश मिल के हिंसक कर्मचारियों का नेतृत्व करता है और उन्हें अहिंसक होने के लिए मनाता है। कैलाश के इस गुण से पद्मा उसकी ओर आकर्षित होती है। एक दिन कर्मचारी विनोद के कामकाज से नाराज होकर हड़ताल कर देते हैं। इसमें पद्मा व्यक्तिगत रूप से कर्मचारियों की आर्थिक मदद करती है। इसी में एक दिन कर्मचारी अपनी बात ले कर विनोद से मिलने आते हैं तो विनोद गोली चला देता है, जिसमें कैलाश भी घायल हो जाता है।
पुलिस विनोद को गिरफ्तार करती है। उसे 5 साल की सजा हो जाती है। अब मिल चलाने की जिम्मेदारी पद्मा के पास आ जाती है। विनोद की अय्याशी और हड़ताल के कारण मिल की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के बावजूद कैलाश के नेतृत्व में कर्मचारी कम वेतन पर भी काम करने को तैयार हो जाते हैं। कुछ दिनों बाद मिल को एक बड़ा टेंडर मिल जाता है, जिससे मिल की स्थिति सुधर जाती है। अंत में कैलाश और पद्मा का विवाह होता है और सभी कर्मचारी खुशी से दोनों को बधाई देते हैं।
आज हमें इस फिल्म में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगता। पर 1935 में यह सेंसर बोर्ड में मंजूरी के लिए गई तो बोर्ड के सदस्यों को ‘आघात’ लगा। मिल मालिक विरोधी इस फिल्म को कैसे मंजूरी दी जाए? यह तो कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच दुश्मनी पैदा करने वाली फिल्म है। बोर्ड के एक पारसी सदस्य बेरामजी जीजीभोय मुंबई के मिल मालिकों के संगठन के अध्यक्ष थे। उन्हें यह फिल्म मिल मालिक विरोधी लगी थी।
फिल्म पर मुंबई में प्रतिबंध लगा दिया गया। दिल्ली और लखनऊ में प्रदर्शित करने दी गई, पर कुछ ही समय में इसने कर्मचारियों को उकसाया तो इसे वहां भी प्रतिबंधित कर दिया गया। विडंबना देखिए कि फिल्म देख कर स्क्रीन राइटर बनारस स्थित धनपतराय के प्रिंटिंग प्रेस के कर्मचारियों ने बाकी वेतन के लिए हड़ताल कर दिया था। धनपत का मुंबई का सपना चकनाचूर हो गया। एक तो फिल्म नहीं रिलीज हुई, ऊपर से प्रिंटिंग प्रेस बंद हो गया। उन्होंने अपने एक मित्र को भेजी चिट्ठी में लिखा था, ‘सिनेमा का धंधा शराब के धंधे जैसा है। लोगों को पता नहीं कि किसे अच्छा कहा जाए और किसे खराब कहा जाए। मैंने सोच-विचार कर यह दुनिया छोड़ देने का निश्चय कर लिया है।’
1935 में उन्होंने मुंबई छोड़ कर फिर से बनारस की राह पकड़ ली। शायद यह अच्छा ही हुआ। उनके जाने से भारतीय सिनेमा का नुकसान जरूर हुआ, पर भारतीय साहित्य को फायदा हुआ। ‘मिल मजदूर’ फिल्म की प्रिंट तो अब नहीं मिल रही, पर उसके असफल स्क्रीन राइटर धनपतराय श्रीवास्तव को हम सभी आज मुंशी प्रेमचंद के रूप में जानते हैं।

About author 

वीरेन्द्र बहादुर सिंह जेड-436ए सेक्टर-12, नोएडा-201301 (उ0प्र0) मो-8368681336

वीरेन्द्र बहादुर सिंह
जेड-436ए सेक्टर-12,
नोएडा-201301 (उ0प्र0)


Related Posts

ज़िम्मेदार आख़िर कौन

September 3, 2022

“ज़िम्मेदार आख़िर कौन” pic credit -freepik यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:। अर्थात : जिस परिवार

पहले अपने अवगुणों का बाॅयकोट करो

September 2, 2022

“पहले अपने अवगुणों का बाॅयकोट करो” आजकल सोशल मीडिया पर एक ट्रेंड चल रहा है “बाॅयकोट” यानी कि बहिष्कार का।

आईएनएस विक्रांत( INS-VIKRANT)

September 2, 2022

आईएनएस विक्रांत( INS-VIKRANT) मेक इन इंडिया – विमान वाहक युद्धपोत बनाने में भारत की आत्मनिर्भरता की क्षमता का प्रदर्शन भारत

लड़कियों को लड़कों से ज्यादा पोषण में सुधार की जरुरत

September 1, 2022

लड़कियों को लड़कों से ज्यादा पोषण में सुधार की जरुरत लड़के और लड़कियों दोनों के कुपोषित होने की संभावना लगभग

मन की प्रसन्नता

September 1, 2022

मन की प्रसन्नता प्रसन्नता हमारा ऐसा अनमोल ख़जाना है, जितना लुटाएंगे उतना बढ़ता चला जाएगा मन की प्रसन्नता अनेक मानसिक,

राष्ट्रीय पोषण सप्ताह 1 से 7 सितंबर 2022 पर विशेष

August 31, 2022

राष्ट्रीय पोषण सप्ताह 1 से 7 सितंबर 2022 पर विशेष स्वास्थ्य ही धन है कुपोषण को हराने राष्ट्रीय पोषण सप्ताह

Leave a Comment