Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

cinema, lekh, Virendra bahadur

मिलन की रैना और ‘अभिमान’ का अंत | milan ki Raina aur abhiman ka ant

सुपरहिट  मिलन की रैना और ‘अभिमान’ का अंत जिस साल अमिताभ बच्चन की पहली सुपरहिट फिल्म ‘जंजीर’ आई (मई 1973), …


सुपरहिट 

मिलन की रैना और ‘अभिमान’ का अंत

मिलन की रैना और 'अभिमान' का अंत | milan ki Raina aur abhiman ka ant
जिस साल अमिताभ बच्चन की पहली सुपरहिट फिल्म ‘जंजीर’ आई (मई 1973), उसके तीन महीने बाद जुलाई में ‘अभिमान’ आई। निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की अमिताभ के साथ यह पहली फिल्म थी। इसके बाद तुरंत चार महीने में ‘नमक हराम’ आई। इसके बाद तो ऋषि दा की अमिताभ के साथ ‘चुपके चुपके’, ‘मिली’, ‘अलाप’, ‘जुर्माना’ और ‘बेमिसाल’ आई थीं। ‘जंजीर’ जैसी मारधाड़ वाली ऐक्शन फिल्म के बाद अमिताभ ने कम बजट वाली समांतर और ‘साफ-सुथरी’ फिल्में करना चालू रखा था। इसकी शुरुआत ‘अभिमान’ से हुई थी। 
‘अभिमान’ एक असामान्य फिल्म थी। गीत-संगीत के एक ही व्यवसाय में काम करने वाले दंपति के बीच एक-दूसरे की प्रतिभा और लोकप्रियता को ले कर अभिमान की टक्कर होती है, इस तरह की कहानी का विचार ऋषिकेश मुखर्जी को तब आया, जब सिनेमा से जुड़े लोगों के परिवारों की आंतरिक खटपट की खबर उजागर हुई थी। फिल्म इतनी अधिक वास्तविक और प्रामाणिक लग रही थी कि इसके पीछे किसी असली दंपति का संदर्भ न हो तो आश्चर्य की बात थी। उस समय और आज भी लोग सोचते हैं कि यह किस की कहानी थी, जिसे ऋषि दा ने परदे पर साकार किया था।
ब्रिटिश राज में (मध्य प्रदेश) के मैहर स्टेट के महाराजा बृजनाथ सिंह के दरबार में सरोदवादक बाबा अलाउद्दीन खान के यहां तालीम लेने आने वाले 18 साल के पंडित रविशंकर और 13 साल की उनकी बेटी अन्नपूर्णा का विवाह हुआ था। दोनों ही शास्त्रीय संगीत में माहिर थे। इसीलिए एक हुए थे। पर समय बीतने के साथ यही विवाद का कारण बना। कहा जाता है कि अन्नपूर्णा को अधिक कार्यक्रम और वाहवाही मिलती थी, जिससे रविशंकर का ‘पुरुष अहं’ घायल होता था। 
परिणामस्वरूप अन्नपूर्णा देवी पंडितजी और सार्वजनिक जीवन से खिसकती गईं। 1962 में पंडितजी से अलग हो कर उन्होंने मुंबई के फ्लैट में खुद को कैद कर लिया था। ‘मानुषी’ के नारीवादी संपादक मधु किश्वर ने ट्विटर पर लिखा है कि ‘रविशंकर ने अन्नपूर्णा के संगीत को कैरियर बरबाद कर दिया है। वह पंडित की अपेक्षा अधिक प्रतिभावान थीं और एक कार्यक्रम में तो पंडित ने क्रूरता से उन्हें घसीटा था। उसी दिन से उन्होंने कार्यक्रम बंद कर दिया था।’
‘अभिमान’ की ऐसी ही कहानी थी। एक प्रोफेशनल गायक सुबिर (अमिताभ) गांव की गोरी उमा (जया बच्चन) से मिलता है और उसकी प्रकृति द्वारा मिली गायकी से आकर्षित हो कर उससे विवाह करता है। विवाह के बाद उमा की गायिकी रंग लाती है और उसका कैरियर चमक उठता है, जबकि सुबिर का कैरियर डूबने लगता है। इससे उसका अहंकार घायल होता है और दंपति के बीच खटराग शुरू हो जाता है। परिणामस्वरूप उमा गायिकी छोड़ कर मायके चली जाती है। 
गुजराती लेखक-कार्टूनिस्ट आबिद सुरती के बेटे आलिफ सुरती ने 2002 में ‘मेन्स वर्ल्ड’ नामक अंग्रेजी अखबार के लिए अन्नपूर्णा देवी का एक दुर्लभ इंटरव्यू किया था।(अन्नपूर्णा देवी न तो फ्लैट से बाहर आती थीं न किसी से मिलती थीं)। उसमें उन्होंने कहा था, ‘मैं जब परफार्म करती थी और लोग दाद देते थे तो यह पंडितजी को अच्छा नहीं लगता था। मुझे तो वैसे भो परफार्म करने में कोई रुचि नहीं थी, इसलिए मैंने परफार्म करना बंद कर दिया और साधना चालू रखी।’
सुरती लिखते हैं कि ‘अभिमान’ फिल्म शुरू करने से पहले ऋषिकेश मुखर्जी ने अन्नपूर्णा देवी से कहानी को लेकर चर्चा की थी। फिल्म में तो दंपति बाद में मिल जाते हैं, पर असल जीवन में रविशंकर और अन्नपूर्णा देवी ने तलाक ले लिया था। विवाह को बचाने के लिए अन्नपूर्णा देवी ने बाबा और शारदा माता के समक्ष वचन दिया था कि वह कभी भी सार्वजनिक रूप से परफार्म नहीं करेंगी। पर उनका यह बलिदान भी उनके दांपत्य को बचा नहीं सका था। 
वरिष्ठ फिल्म-पत्रकार राजू भारतन का दावा है कि ‘अभिमान’ की कहानी किशोर कुमार और रूमा देवी पर आधारित थी। एक जगह उन्होंने लिखा है, ‘हम जो जानते उसके अनुसार, किशोर कुमार की पत्नी (अमित की मां) रूमा देवी कम प्रतिभाशाली नहीं थीं। किशोर कुमार को उनके कैरियर के शुरुआत में कम संघर्ष नहीं करना पड़ा, पर उन्हें यह पता था कि रूमा में कुदरती रूप से ही संगीत की प्रतिभा थी। ऋषि दा एक अच्छे कहानीकार थे। उन्होंने इस विषय को पकड़ कर ‘अभिमान’ में अच्छी कहानी गढ़ी थी।
किशोर कुमार तो खैर बड़े भाई अशोक कुमार की देखादेखी फिल्मों में आए थे, पर संगीत तो रूमा देवी ठाकुरता के परिवार में ही था। उनकी माता सत्यजित रे के संबंध में थीं। रूमा ने बचपन में नृत्य सीखा था। उन्होंने दिलीप कुमार की पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा’ में काम किया था।1951 में किशोर कुमार से विवाह कर के मुंबई आई थीं, पर विवाह के 8 साल बाद तलाक ले कर वह कोलकाता वापस चली गई थीं। कहा जाता है कि रूमा कैरियर पसंद स्त्री थीं। जबकि किशोर कुमार ‘घरेलू पत्नी’ चाहते थे। इसी वजह से दोनों में अनबन हुई थी।
रविशंकर-अन्नपूर्णा देवी और किशोर कुमार-रूमा देवी के वैवाहिक जीवन में काफी समानता थी। हो सकता है ऋषि दा को इन दोनों पर ही फिल्म बनाने का विचार आया हो। जो कुछ भी हो, पर ‘अभिमान’ में उन्होंने वैवाहिक संबंध की जटिलता को नारीवादी दृष्टिकोण से जिस तरह पेश किया था, उसकी दर्शकों ने खूब सराहना की थी। एक तो इसकी कहानी बहुत सशक्त थी, दूसरे इसके मुख्य कलाकार (अमिताभ, जया, बिंदु, असरानी, ए के हंगल, दुर्गा खोटे) ने उम्दा अभिनय किया था और तीसरे उसका संगीत (सचिनदेव बर्मन) लाजवाब था। फिल्म को 1974 को बेस्ट एक्ट्रेस, बेस्ट म्युजिक और बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर और एक्ट्रेस का फिल्मफेयर अवार्ड मिला था। 
अमिताभ और जया के विवाह के कुछ महीने बाद ही फिल्म रिलीज हुई थी और फिल्म में भी नवविवाहित दंपति की बात थी, इसलिए फिल्म की वास्तविकता बहुत निखरी थी। खासकर इसमें सुबिर का ‘पुरुष अहं’ जिस तरह पेश किया गया था, उससे लोगों को लगा था कि कैरियर पसंद पुरुष ऐसे हो होते हैं और पत्नियों को उनकी परछाई बन कर रहना पड़ता है। पत्नी की इस मजबूरी को मजरूह सुल्तानपुरी ने खूबसूरती से इन शब्दों में पेश किया था-
‘पिया ऐसे रूठे कि होंठों से मेरे संगीत रूठा
कभी जब मैं गाऊं लगे मेरे मन का हर गीत झूठा
ऐसे बिछड़े हो… ऐसे मोसे रसिया
पिया बिना पिया बिना पिया बिना बसिया’
फिल्म में अभिमान की लड़ाई इतनी तीव्र थी कि एक फैंस उमा को देख कर जोर से ‘राधा ओ राधा’ कहता है तो ईर्ष्या में जल उठा सुबिर धीरे से कहता है, ‘वाह, क्या क्लासिक नाम है।’ इसी तरह सुबिर उमा से पूछता है कि क्या तुम्हें मेरा गाना अच्छा लगता है? तब उमा उसके गानों को ‘हा हू चिखना-चिल्लाना बताती है।’ तीसरे एक दृश्य में सुबिर उसकी एक दोस्त चित्रा (बिंदु) के यहां शराब के पैग में दुख को डुबोते हुए कहता है, “पहले भी अकेला था, अब भी अकेला हूं।’
फिल्म नकारात्मक न बन जाए इसके लिए ऋषि दा ने मायके जा रही उमा का गर्भपात हो जाता है और सुबिर का हृदय परिवर्तन होता है, यह अंत कर के फिल्म को पारिवारिक फिल्म बना दिया था। इसमें भी एक गाने में मजरूह साहब और बर्मन दा ने कमाल कर दिया था। फिल्म की शुरुआत किशोर कुमार के सोलो गाने ‘मीत न मिला रे मन का… ‘ गाने से होती है (जो उमा का मन ‘चीखना-चिल्लाना वाला गाना है) और फिल्म का अंत किशोर-लता के ड्युएट से होता है। इसमें पति-पत्नी का पुनर्मिलन तो है ही, उमा की गायिकी की वापसी भी है। इसमें सुबिर गाता है, ‘तेरे मिलन की ये रैना नया गुल कोई खिलाएगी।’
उसका साथ देते हुए उमा कहती है, ‘नन्हा सा गुल खिलेगा अंगना सूनी बंइया सजेगी सजना।’
यह एक पंक्ति में सूना हाथ फिर से सजाने और नया जीवन शुरू करने की उम्मीद थी। यही ‘अभिमान’ का अंत भी था।

कलाकारों को मिले हैं, जो अमुक कैंप के लाडले हैं या फिर उनके साथ उनका नाम जुड़ा है। फिल्म कैसी थी  इस कोई फर्क नहीं पड़ता। हां, आप की पहुंच कितनी है और किसकी फेवरिट लिस्ट में हैं, यह महत्वपूर्ण है। इसमें कुछ नाम पक्के हैं। इसमें करण जौहर का नाम सब से ऊपर है।

खैर, आदमी कोई भी हो, भारतीय अवार्ड अपना सातत्य खो चुके हैं, साथ ही साथ इनकी और सम्मान भी खो चूका है। इसलिए हमारे यहां जो सचमुच में अच्छा काम कर रहे हैं, विदेशी अवार्ड के लिए उनका नाम आगे आए इसकी राह देखते रहते हैं। इसमें वे लोग भी शामिल हैं, जो सालोंसाल से फिल्म अवार्ड पा रहे हैं।

About author 

वीरेन्द्र बहादुर सिंह जेड-436ए सेक्टर-12, नोएडा-201301 (उ0प्र0) मो-8368681336

वीरेन्द्र बहादुर सिंह
जेड-436ए सेक्टर-12,
नोएडा-201301 (उ0प्र0)
मो-8368681336


Related Posts

करवा चौथ में चाँद को छलनी से क्यों देखते हैं?

October 31, 2023

करवा चौथ में चाँद को छलनी से क्यों देखते हैं? हिन्दू धर्म में अनेक त्यौहार हैं, जिन्हें भक्त, पूरे श्रद्धाभाव

परिवार एक वाहन अनेक से बढ़ते प्रदूषण को रेखांकित करना जरूरी

October 31, 2023

परिवार एक वाहन अनेक से बढ़ते प्रदूषण को रेखांकित करना जरूरी प्रदूषण की समस्या से निपटने सार्वजनिक परिवहन सेवा को

सुहागनों का सबसे खास पर्व करवा चौथ

October 30, 2023

सुहागनों का सबसे खास पर्व करवा चौथ 1 नवंबर 2023 पर विशेष त्याग की मूरत नारी छाई – सुखी वैवाहिक

वाह रे प्याज ! अब आंसुओं के सरताज

October 28, 2023

वाह रे प्याज ! अब आंसुओं के सरताज किचन के बॉस प्याज ने दिखाया दम ! महंगाई का फोड़ा बम

दिवाली की सफाई और शापिंग में रखें स्वास्थ्य और बजट का ध्यान

October 28, 2023

दिवाली की सफाई और शापिंग में रखें स्वास्थ्य और बजट का ध्यान नवरात्र पूरी हुई और दशहरा भी चला गया,

शरद पूर्णिमा एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण

October 28, 2023

शरद पूर्णिमा एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण हिंदू कैलेंडर में सभी व्रत त्यौहार चंद्रमा की कलाओं के अनुसार निर्धारित तिथियों पर मनाए

PreviousNext

Leave a Comment