Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Aalekh, sudhir_srivastava

नारी की समाज में नारायणी भूमिका -सुधीर श्रीवास्तव

नारी की समाज में नारायणी भूमिका सृष्टि निर्माण और उसके अबाध संचालन के केंद्र में नारी है, ईश्वर के बाद …


नारी की समाज में नारायणी भूमिका

नारी की समाज में नारायणी भूमिका -सुधीर श्रीवास्तव

सृष्टि निर्माण और उसके अबाध संचालन के केंद्र में नारी है, ईश्वर के बाद सांसारिक धुरी नारी ही है।नारी सिर्फ सृजक भर नहीं है।सृजन संतुलन भी नारी ही करती है। नारी के विविध रुपों का दर्शन और समय के साथ नारी सशक्तीकरण में भी नारियां पीछे नहीं हैं।
अबला के ठप्पे को हटाते हुए आज की नारी नर के साथ अग्रिम पंक्ति में शान से बराबरी करने में हिचकिचाहट नहीं दिखाती। आज की नारी शारीरिक कमजोरियों का बहाना नहीं बनाती।
नारी को नारायणी यूँ ही नहीं कहा जाता। जन्म से लेकर मृत्यु तक के विविध आयामों को विभिन्न रुपों में निर्वहन करना हंसी खेल नहीं है। बेटी होने और मायके की दहलीज को पारकर ससुराल की चौखट के भीतर जाकर अनदेखे, अंजाने लोगों के बीच खुद को तिल तिल होम की भाँति आहुति बन जाना देना, बहुतेरे रिश्तों में सामंजस्य बिठाने के अलावा घर को व्यवस्थित करते हुए घर चलाने का फार्मूला आज भी किसी पहेली से कम नहीं है।
नारी की पूजा भी होती है और नारी ही पूजती भी है।ये अधिकार या गौरव नर पा ही नहीं सकता।शायद इसी लिए नारी को नारायणी की संज्ञा भी दी जाती है।आश्चर्य यह भी कि नारी को समझ पाना भी नारायण के भी वश में नहीं है।नारी सबकुछ करते हूए भी किसी अबूझ पहेली जैसी है।
आज नारी की भूमिका समाज में रेखांकित करना भी किसी भी.दृष्टिकोण से आसान नहीं है। आदिकाल से लेकर आज तक नारियों की समाज में भूमिका प्रभावी ही होती रही है। नारी की समाज, राष्ट्र ही नहीं परिवार में जो भूमिका है, वह सराहनीय होने के अलावा बड़ी लकीर ही बन रही है।
अब इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि जब परिवार के साथ साथ नारी हर क्षेत्र में खुद को स्थापित कर अपने को सिद्ध कर रही है तब भी पुरुषों की मानसिकता में वह बदलाव नहीं दिखता जो दिखना चाहिए। कुछेक सभ्य पुरुषों की मानसिकता आज भी कुंठित है और वे किसी भी हद तक जाकर भी समाज में उनके योगदान को नकार ही नहीं रहे हैं,बल्कि उन्हें अबला, असहाय और बेचारी होने की गला फाड़कर दुहाई ही देते घूम रहे हैं।
अंत में सिर्फ इतना ही कह सकता हूं कि नारी की समाज में बढ़ती और स्थापित हो रही बहुआयामी भूमिका पुरुषों से अधिक प्रभावी सिद्ध होने की ओर अग्रसर है। शायद नारी के नारायणी होने का यही विलक्षणता उन्हें विशिष्ट बनाने की ओर अग्रसर है।

 सुधीर श्रीवास्तव
गोण्डा, उ.प्र.
8115285921
©मौलिक, स्वरचित


Related Posts

Hindi divas 14 september lekh by Mamta Kushwaha

September 13, 2021

हिन्दी दिवस-१४ सितम्बर   जैसा की हम सभी जानते है हिन्दी दिवस प्रति वर्ष १४ सितम्बर को मनाया जाता हैं

maa ko chhod dhaye kyo lekh by jayshree birmi

September 13, 2021

 मां को छोड़ धाय क्यों? मातृ भाषा में व्यक्ति अभिव्यक्ति खुल के कर सकता हैं।जिस भाषा सुन बोलना सीखा वही

Hindi maathe ki bindi lekh by Satya Prakash

September 13, 2021

हिंदी माथे की बिंदी कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, साक्षर से लेकर निरीक्षर तक भारत का प्रत्येक व्यक्ति हिंदी को

Jeevan aur samay chalte rahenge aalekh by Sudhir Srivastava

September 12, 2021

 आलेख        जीवन और समय चलते रहेंगें              कहते हैं समय और जीवन

Naari gulami ka ek prateek ghunghat pratha by arvind kalma

July 23, 2021

नारी गुलामी का एक प्रतीक घूंघट प्रथा भारत में मुगलों के जमाने से घूँघट प्रथा का प्रदर्शन ज्यादा बढ़ा क्योंकि

vyangkatha- police ka chakravyuh by suresh bhatia

June 23, 2021

व्‍यंग्‍य कथा –पुलिस का चक्रव्‍यूह. मुंगेरी ने कसम खायी थी उसका कितना ही बड़ा नुकसान हो जावे, थाने में रिपोर्ट

Leave a Comment