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Jitendra_Kabir, poem

तोड़ा क्यों जाए?- जितेन्द्र ‘कबीर

तोड़ा क्यों जाए? गुलाब!तुम सलामत रहनाअपनी पत्तियों, टहनियों, जड़ों,परिवेश और वजूद के साथ,तुम्हारी महक और खूबसूरतीका इस्तेमाल नहीं करना है …


तोड़ा क्यों जाए?

तोड़ा क्यों जाए?- जितेन्द्र 'कबीर

गुलाब!
तुम सलामत रहना
अपनी पत्तियों, टहनियों, जड़ों,
परिवेश और वजूद के साथ,
तुम्हारी महक और खूबसूरती
का इस्तेमाल नहीं करना है मुझे
अपने स्वार्थ के लिए,
तुम्हें तुम्हारी बगिया में
फलते-फूलते देखकर कर लूंगा मैं तुष्टि
अपने सौंदर्य बोध की,
तुम कुछ दिन बाद मुरझाकर
मर भी जाओगे
तो मुझे तसल्ली रहेगी कि
आखिरी समय में तुम
अपनों के साथ थे,
कि मेरी नज़र में गुनाह है
किसी को भी अपनी जड़ों से
दूर करना,
उसके परिवेश से दूर
उसे तिल-तिल मरने पर
मजबूर करना

जितेन्द्र ‘कबीर
यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है।
साहित्यिक नाम – जितेन्द्र ‘कबीर’
संप्रति – अध्यापक
पता – जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश
संपर्क सूत्र – 7018558314


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