तू डोर मैं पतंग
ईश्वर के हाथों में जीवन डोर-
हम पतंग जैसे उड़ रहे।
खींचता और ढील देता विधाता
हम नाचते अंहकार में–
नचाता है विधाता।
है कठपुतली हम और…..
जिस ओर कर्म का प्रारब्ध ले जाता—
हम बस पंतग बन उड़ान भरते।
हम बस पतंग समान बल खाते—डोर ईश संभालता।।





