Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

lekh, satyawan_saurabh

छुआछूत की बीमारी की तरह फैलती है हिंसा

छुआछूत की बीमारी की तरह फैलती है हिंसा हिंसा के शिकार लोगों को समझाना जरुरी है। बदला लेने की मानसिकता …


छुआछूत की बीमारी की तरह फैलती है हिंसा

छुआछूत की बीमारी की तरह फैलती है हिंसा

हिंसा के शिकार लोगों को समझाना जरुरी है। बदला लेने की मानसिकता नुक़सान करवाती है, ताकि वो फिर उसी हिंसक दुष्चक्र में न फंस जाएं। कोई शराबी है या ड्रग का आदी है, तो उसकी इलाज करने में मदद की जाती है। फिर उसे रोज़गार दिलाने की कोशिश होती है। तभी कोई भी शख़्स एकदम से बदला हुआ नज़र आ सकता है। लोगों के बर्ताव में बदलाव लाकर हम कई चुनौतियों को जड़ से ख़त्म कर सकते हैं। जैसे साफ़-सफ़ाई की आदत से डायरिया जैसी बीमारी को रोका जा सकता है। ये क़दम तब और असरदार हो जाते हैं, जब एक पीड़ित, दूसरे की मदद करता है। वो अपने ख़ुद के तजुर्बे साझा कर के लोगों का भरोसा जीत सकते हैं। जैसे कोई टीबी-हैजा के मरीज़ रहे लोग इसके शिकार लोगों के बीच काम करें। हिंसक बर्ताव एक महामारी है, जो छुआछूत की बीमारियों की तरह एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलती है।

डॉ सत्यवान सौरभ
बुद्धिमान लड़ाई से पहले जीतते हैं, जबकि अज्ञानी जीतने के लिए लड़ते हैं। संघर्ष के प्रति बुद्धिमान दृष्टिकोण लड़ाई या हिंसा में शामिल होने से पहले योजना बनाना और रणनीति बनाना शामिल है, जबकि अज्ञानी दृष्टिकोण परिणामों या संभावित परिणामों पर विचार किए बिना केवल लड़ना या हिंसा करना है। अर्थात बौद्धिक विचार यह है कि किसी स्थिति का सावधानीपूर्वक आंकलन करके और सूचित निर्णय लेकर, कोई भी व्यक्ति शारीरिक युद्ध या हिंसा का सहारा लिए बिना जीत हासिल कर सकता है। यह उद्धरण सलाह देता है कि बुद्धिमानी ऐसी स्थिति को पहले से ही भांप लेने में है जो हिंसा में बदल सकती है और फिर इससे बचने के लिए अपने संसाधनों का उपयोग करना चाहिए।

क्या होता है जब हिंसा को टाला नहीं जा सकता?

 जब कूटनीति के प्रयास विफल हो जाते हैं, तब भी दुश्मन की ताकत और कमजोरियों का आंकलन करके दूसरे पक्ष पर तुरंत काबू पाने के लिए हिंसा को टाला जा सकता है। दुश्मन या विपक्षी को भ्रमित करने और उनके संसाधनों को बर्बाद करने के लिए धोखे और झूठ का भी इस्तेमाल किया जाता है। हिंसा को क़ानून-व्यवस्था के मसले जैसा समझने के बजाय, इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौती के तौर पर लिया जाये। हिंसक बर्ताव एक महामारी है, जो छुआछूत की बीमारियों की तरह एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलती है। जो लोग हिंसा के पीड़ित होते हैं, उनके हिंसा करने की आशंका बढ़ जाती है। “हिंसा को ठीक उसी तरह रोका जा सकता है, जैसे गर्भधारण से जुड़ी चुनौतियां, काम के दौरान लगने वाली चोटों या संक्रामक बीमारियों को रोका जाता है। “दिक़्क़त ये है कि दुनिया भर में हिंसा से सख़्ती से निपटने की सोच हावी है। इसलिए हिंसक घटनाओं पर हंगामा होते ही, नेता हों या जनता, सख़्त क़ानून की मांग करने लगते हैं।

इंसान अक्सर जोखिम भरा बर्ताव करता है, ख़तरों से खेलता है। जैसे कि नुक़सान पता होने के बावजूद स्मोकिंग करना या फिर पेट भरने के बावजूद ज़्यादा खाना। बिना एहतियात बरते सेक्स करना। डॉक्टर हमेशा कहते हैं कि इलाज से बचाव बेहतर है। यानी किसी मर्ज़ को होने से ही रोका जाए। लेकिन, जब बात हिंसक बर्ताव की आती है, तो, इससे निपटने का एक ही तरीक़ा लोग बताते हैं, क़ानून सख़्त बना दो। जैसे हाल ही में 12 साल से कम उम्र की बच्ची से बलात्कार पर मौत की सज़ा का प्रावधान। या फिर भीड़ की हिंसा से निपटने के लिए सख़्त क़ानून बनाने पर हमारे देश में विचार चल रहा है। हिंसा को इंसान का जन्मजात बर्ताव मान लिया गया है, जिसे बदला नहीं जा सकता। सोच यही है कि जो लोग हिंसा करते हैं, उन्हें सही रास्ते पर नहीं लाया जा सकता। इसलिए सख़्त क़ानूनों की बात ही की जाती है। लेकिन, सख़्त क़ानूनों से बात बनती होती, तो कब की बन जाती। सऊदी अरब और ईरान में कई जुर्मों के लिए मौत की सज़ा है। मगर अपराध तब भी नहीं रुकते। भारत में भी कई अपराधों के लिए मौत की सज़ा मिलती है। मगर वो जुर्म अब भी होते हैं।

हिंसा से किस प्रकार बचा जा सकता है? आज देश के जातीय दंगों के संदर्भ में, यह उद्धरण दो समुदायों के बीच संघर्षों को सुलझाने में कूटनीति और बातचीत के महत्व पर प्रकाश डालता है। हिंसा का सहारा लेने के बजाय, जिसके सभी संबंधित पक्षों के लिए विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं, बुद्धिमान नेता बातचीत और समझौते के माध्यम से शांतिपूर्ण समाधान ढूंढने का प्रयास करता है। प्राय: पड़ोसी राज्यों या धार्मिक समुदायों के बीच संघर्ष अक्सर होते रहते हैं, इसलिए हिंसा की घटनाओं को कम करने की दिशा में क्षेत्रीय एकीकरण एक महत्वपूर्ण प्रगति है। दोनों पक्षों के पारस्परिक लाभ के लिए विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से निपटाने की संभावना के बारे में निर्णय लेने वालों की अनभिज्ञता के कारण अक्सर दंगा या हिंसा होती है। इस प्रकार यह संभव है कि सामुदायिक विवादों के निपटारे के लिए वैकल्पिक, शांतिपूर्ण तकनीकों को विकसित और संस्थागत बनाकर और राज्यों को उनका उपयोग करने के लिए राजी करके दंगों की रोकथाम में योगदान दे सकते हैं।

इसे राजनीतिक, क्षेत्रीय या राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था के रूप में समझा जा सकता है, जिसमें प्रत्येक इकाई यह स्वीकार करती है कि किसी एक की सुरक्षा भी सभी की सामूहिक चिंता है। अत: वे खतरों और शांति के उल्लंघन के प्रति सामूहिक प्रतिक्रिया के लिए प्रतिबद्ध हैं। इस प्रकार, देश में में चल रहे जातीय संघर्ष को देखते हुए यह उद्धरण समकालीन समय के लिए प्रासंगिक है। यह हमें याद दिलाता है कि सच्ची जीत ज्ञान और दूरदर्शिता के साथ संघर्षों से निपटने और हिंसा से बचने के लिए शांतिपूर्ण समाधान खोजने से हासिल की जाती है। इसके अलावा, इसे न केवल हिंसा के लिए बल्कि रोजमर्रा के संघर्षों और चुनौतियों पर भी लागू किया जा सकता है। साथ ही, यह उद्धरण सफलता प्राप्त करने के लिए तैयारी, ज्ञान और दूरदर्शिता के महत्व पर भी जोर देता है।

हिंसा के शिकार लोगों को समझाना जरुरी है। बदला लेने की मानसिकता नुक़सान करवाती है, ताकि वो फिर उसी हिंसक दुष्चक्र में न फंस जाएं। कोई शराबी है या ड्रग का आदी है, तो उसकी इलाज करने में मदद की जाती है। फिर उसे रोज़गार दिलाने की कोशिश होती है। तभी कोई भी शख़्स एकदम से बदला हुआ नज़र आ सकता है। लोगों के बर्ताव में बदलाव लाकर हम कई चुनौतियों को जड़ से ख़त्म कर सकते हैं। जैसे साफ़-सफ़ाई की आदत से डायरिया जैसी बीमारी को रोका जा सकता है। ये क़दम तब और असरदार हो जाते हैं, जब एक पीड़ित, दूसरे की मदद करता है। वो अपने ख़ुद के तजुर्बे साझा कर के लोगों का भरोसा जीत सकते हैं। जैसे कोई टीबी-हैजा के मरीज़ रहे लोग इसके शिकार लोगों के बीच काम करें।

About author

Satyawan Saurabh

डॉo सत्यवान ‘सौरभ’
कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,
333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा – 127045
facebook – https://www.facebook.com/saty.verma333
twitter- https://twitter.com/SatyawanSaurabh


Related Posts

हिंदी के मुकाबले अंग्रेजी बोलते समय इतनी पॉलिश क्यों दिखाई देती है?

September 13, 2022

हिंदी के मुकाबले अंग्रेजी बोलते समय इतनी पॉलिश क्यों दिखाई देती है? Pic credit -freepik.com भारत ने स्थानीय भाषाओं में

हिंदी हृदय गान है

September 13, 2022

हिंदी हृदय गान है Pic Credit -freepik.com आन-बान सब शान है, और हमारा गर्व। हिंदी से ही पर्व है, हिंदी

मनुष्य में अनमोल गुणों का भंडार

September 13, 2022

मनुष्य में अनमोल गुणों का भंडार चुप रहना और माफ करना दो अनमोल हीरे – चुप रहने से बड़ा कोई

जीते जी कद्र कर लो श्राद्धकर्म की जरूरत नहीं

September 13, 2022

“जीते जी कद्र कर लो श्राद्धकर्म की जरूरत नहीं” Pic credit freepik.com सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमयः पिता मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन

हर महिला को आज़ाद ज़िंदगी जीने का पूरा अधिकार है

September 13, 2022

“हर महिला को आज़ाद ज़िंदगी जीने का पूरा अधिकार है” Pic credit freepik.com “मत सहो बेवजह प्रताड़ना की जलन जागो

अखंड भारत को जोड़ने का नाटक क्यूँ

September 13, 2022

“अखंड भारत को जोड़ने का नाटक क्यूँ” कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के भारत जोड़ो पदयात्रा का मतलब समझ नहीं आ

Leave a Comment