Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

lekh, satyawan_saurabh

ग्रामीण चौपालों को लील गई राजनीति

ग्रामीण चौपालों को लील गई राजनीति गांव मैं अब न तो पहले जैसे त्योहारों की रौनक है और न ही …


ग्रामीण चौपालों को लील गई राजनीति

ग्रामीण चौपालों को लील गई राजनीति

गांव मैं अब न तो पहले जैसे त्योहारों की रौनक है और न ही शादी के वक्त महिलाओं द्वारा गाए जाने गीत। यहां तक की मौत पर हर घर में छा जाने वाला शोक का स्वरूप बदल गया है। पहले गांव में किसी जवान की मौत हो जाने पर उसके अंतिम संस्कार से पूर्व किसी भी घर का चूल्हा नहीं जलता था। लेकिन राजनीति के कारण पैदा हुई कटुता ने प्रेम के बंधन में बंधे गांव का माहौल इस कदर दूषित कर दिया कि महानगरों की खुदगर्जी की संस्कृति गांव में भी पड़ोसी की मौत पर दीवार सटे पड़ोसी की सेहत पर ज्यादा असर नहीं होता।

-डॉ सत्यवान सौरभ

गांव की चौपाल की बात करूँ तो पुराने दिन याद आ जाते हैं, जब गांव के जोहड़/तालाब किनारे100 साल पुराने बरगद के पेड़ के नीचे 15- 20 पुराने दोस्त जो कि अब पड़ोसियों के रूप में बदल गए हैं, बैठे हुए आपस में गपशप लगाते नजर आते थे, उनकी उम्र भी करीब 70- 75 वर्ष हुआ करती थी। जब कभी मैं गांव की चौपाल के पास से गुजरता तो मुझे जहन में यही आता कि क्या कभी मैं भी इन चौपालों में शामिल हो पाऊंगा। लेकिन अब लगता है कि मैं कभी भी गांव की चौपाल में शामिल नहीं हो पाऊंगा। आपमें से ज्यादातर लोगों को पता नहीं होगा कि चौपाल क्या होती है?

रही नहीं चौपाल में, पहले जैसी बात।
नस्लें शहरी हो गई, बदल गई देहात।।
जब से आई गाँव में, ये शहरी सौगात।
मेड़ करें ना खेत से, आपस में अब बात।।

चार दशक पूर्व तक भारत के गांव कितने प्यारे थे, अपनी खूबसूरती पर चौपाले इतराया करती थी। उस वक्त चौपाले बारहमासी थी। सर्दियों में मुड्डों पर बैठे बुजुर्ग ग्रामीण बीचों-बीच चलते अलाव के सहारे आधी रात गुजर जाने तक बतियाते रहते थे। हालांकि उस वक्त पंचायती राज की राजनीति भी गांव में घुस चुकी थी इसके बावजूद ग्रामीणों के मन और मस्तिष्क साफ-सुथरे थे। हुक्के की गुड़गुड़ाहट के बीच उस वक्त धार्मिक एवं सामाजिक कथाओं पर आधारित साफ-सुथरी चर्चाएं हुआ करती थी। बदलते परिवेश में आज इन चर्चाओं को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दिया है। अब अधिकांश गांव में बारहमासी चौपाले सजने की बात तो कोसों दूर यदा-कदा चर्चाओं की गूंज सुनाई देती है। चौपाल से पूरी तरह तलाक पा चुके गांव के लोग दूषित होती मानसिकता के चलते टीवी मोबाइल या फिर चूल्हे तक सीमित हो चुके है।

शहरी होती जिंदगी, बदल रहा हैं गाँव।
धरती बंजर हो गई, टिके मशीनी पाँव।।
गलियां सभी उदास हैं, सब पनघट हैं मौन।
शहर गए गाँव को, वापस लाये कौन।।

गांवों की चौपालें राजनीति का ककहरा सीखने की पाठशाला रही हैं तो ग्रामीणों के आपसी विवादों को निपटाने की अदालत भी। हुक्का गुड़गुड़ाते पंच जब किसी फैसले पर पहुंचते हैं तो उसे पंच परमेश्वर के निर्णय के रूप में माना जाता रहा है। बड़ी बात यह है कि चौपाल पर होने वाले पंचायती फैसलों को अदालत में भी तरजीह मिलती है। इसी प्रकार चौपाल से राजनीतिक फरमान भी सुनाए जाते रहे हैं तथा जिसके पक्ष में पंचायती फैसला हो गया, फिर उसे गांव-बस्ती के लोग मिलकर फलीभूत करते रहे हैं।
गांव की चौपाल की बात करूँ तो पुराने दिन याद आ जाते हैं, चौपाल उसे कहते हैं, जहां बैठक आयोजित हो और क्षेत्र चारों ओर से खुला हो, यहां पर गांव के लोग बैठकर देश –विदेश की बातें करते या फिर गांव के भविष्य के बारे में चर्चा करते। आसान भाषा में मैं कह सकता हूं कि बरगद के नीचे 4-5 चारपाइयों पर बैठे वे बुजुर्ग चौपाल का हिस्सा होते हैं।

बदल गया तकरार में, अपनेपन का गाँव।
उलझ रहें हर आंगना, फूट-कलह के पाँव।।
पत्थर होता गाँव अब, हर पल करे पुकार।
लौटा दो फिर से मुझे, खपरैला आकार।।

गांव मैं अब न तो पहले जैसे त्योहारों की रौनक है और न ही शादी के वक्त महिलाओं द्वारा गाए जाने गीत। यहां तक की मौत पर हर घर में छा जाने वाला शोक का स्वरूप बदल गया है। पहले गांव में किसी जवान की मौत हो जाने पर उसके अंतिम संस्कार से पूर्व किसी भी घर का चूल्हा नहीं जलता था। लेकिन राजनीति के कारण पैदा हुई कटुता ने प्रेम के बंधन में बंधे गांव का माहौल इस कदर दूषित कर दिया कि महानगरों की खुदगर्जी की संस्कृति गांव में भी पड़ोसी की मौत पर दीवार सटे पड़ोसी की सेहत पर ज्यादा असर नहीं होता। अब गांव की चौपाल सिमट गयी है और घर में शाम को खाना होते वक्त हर घर की चौपाल वहीं पर आयोजित होती हैं। अब शायद गांव की चौपाल, फिर से जिन्दा नहीं हो पाएगी। बड़ा दुख होता है यह कहते हुए की मेरे देश की सबसे सच्ची न्याय प्रणाली आज खत्म हो रही हैं।

खत आया जब गाँव से, ले माँ का सन्देश।
पढ़कर आंखें भर गई, बदल गया वो देश।।
लौटा बरसों बाद मैं, बचपन के उस गाँव।
नहीं रही थी अब जहाँ, बूढी पीपल छाँव।।

परिवर्तन प्रकृति का नियम है और गांव में आया सांस्कृतिक सामाजिक व आर्थिक बदलाव में किसी दूसरे ग्रह से चलकर नहीं आया। बल्कि इंसान नहीं समय की रफ्तार से पैदा हुई आधुनिकता की दौड़ में शामिल होने के लिए नए आयामों को तलाशा में अंगीकार किया है। जिस प्रकार पुरानी इमारतें जमींदोज हो जाती है। ठीक उसी प्रकार पुरातन परंपराओं की छाती पर नए संसाधनों और संस्कृति ने स्वयं को प्रतिस्थापित किया है। अब हम लोगों का ये दायित्व बनता है कि हम सभी एक होकर ऐसी पुरानी परंपराओं को जोड़ें जो हमें मिलजुल कर रहने के लिए प्रेरित करें। चौपालों में लिए गए निर्णय पर शायद कभी अपील नहीं की जाती थी। इन सवालों के निर्णय में इंसानियत जिंदा नजर आती थी। मगर आज न्याय प्रणाली में इंसानियत से ज्यादा पैसों का महत्व नजर आता है। क्या मेरे देश में फिर से, क्या मेरे गांव में फिर से, उस बरगद के पेड़ के नीचे चौपाल बैठ पाएगी? खैर यह सोच कर भी क्या करना, क्योंकि चौपाल में बैठने का समय भी किसके पास रह गया ?

अपने प्यारे गाँव से, बस है यही सवाल।
बूढा पीपल हैं कहाँ,गई कहाँ चौपाल।।
चिठ्ठी लाई गाँव से, जब यादों के फूल।
अपनेपन में खो गया, शहर गया मैं भूल।।

About author

Satyawan saurabh
 डॉo सत्यवान ‘सौरभ’
कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,
333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा – 127045
facebook – https://www.facebook.com/saty.verma333
twitter- https://twitter.com/SatyawanSaurabh


Related Posts

आपत्तिजनक कंटेंट का देना होगा जवाब, सोशल मीडिया कंपनियों पर नकेल।

October 30, 2022

 आपत्तिजनक कंटेंट का देना होगा जवाब, सोशल मीडिया कंपनियों पर नकेल। सोशल मीडिया पर लोगों की मनमानी को लेकर बहुत

चिड़िया मुक्त हुई – ट्विटर को खरीदने की डील पूरी हुई /Twitter deal-completed

October 30, 2022

 चिड़िया मुक्त हुई – ट्विटर को खरीदने की डील पूरी हुई  आओ निरंतर नवाचार और सीख़ने की आदत डालें  सभ्यता

लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की 147 वीं जयंती एकता दिवस पर विशेष/iron man sardar vallabhbhai patel 147 birth anniversary special

October 30, 2022

लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की 147 वीं जयंती एकता दिवस पर विशेष/iron man sardar vallabhbhai patel 147 birth anniversary

क्या गर्भपात नैतिक रूप से उचित है?| Is abortion morally justified?

October 29, 2022

 क्या गर्भपात नैतिक रूप से उचित है?|Is abortion morally justified? लैंगिक समानता के लिए गर्भपात का अधिकार महत्वपूर्ण है। अलग-अलग

हेट स्पीच| Hate speech

October 28, 2022

हेट स्पीच आओ हेट स्पीच, अनैतिक आचरण को जड़ से समाप्त करें आध्यात्मिकता, हेट स्पीच अनैतिक आचरण को दूर करने

भारतीय नोट पर मां लक्ष्मी गणेश/bhareey noto par ma lakshmi Ganesh

October 27, 2022

भारतीय नोट पर मां लक्ष्मी गणेश भारतीय मुद्रा पर मां लक्ष्मी गणेश के स्वरूप छापने के प्रस्तावित बयान पर शाब्दिक

Leave a Comment