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काव्य संग्रह - मोम की मानिंद पुस्तक समीक्षा

काव्य संग्रह – मोम की मानिंद पुस्तक समीक्षा

काव्य संग्रह – मोम की मानिंद पुस्तक समीक्षा काव्य संग्रह – मोम की मानिंद लेखिका – एन. प्रीति बौद्ध पुस्तक …


काव्य संग्रह – मोम की मानिंद पुस्तक समीक्षा

काव्य संग्रह – मोम की मानिंद
लेखिका – एन. प्रीति बौद्ध
पुस्तक मूल्य – 135/- रूपये
प्रकाशन – देवसाक्षी पब्लिकेशन रावतसर, हनुमानगढ़ (राजस्थान)
समीक्षक – अरविन्द कालमा

राजस्थान के देवसाक्षी पब्लिकेशन से प्रकाशित दोस्त एन. प्रीति बौद्ध का प्रथम काव्य संग्रह ‘मोम की मानिंद’ संघर्ष, शिक्षा, क्रांति और पीड़ा को बयां करती शानदार कृति है। लेखिका ने इसमें कुल 42 कविताओं को संकलित किया है, प्रत्येक कविता बहुजन विचारधारा से ओतप्रोत है। ये उनकी पहली पुस्तक है जिसमें उन्होंने करुणा, दुःख, यथार्थवाद को जगह दी है और पाखंडवाद की बेबाकी से पोल खोलकर रख दी है। उत्तर प्रदेश की निवासी प्रीति बौद्ध वर्तमान में सम्यक संस्कृति साहित्य संघ अलीगढ़ की महासचिव हैं और कई साहित्यिक मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाती रही हैं।

बात करें उनकी कविताओं की तो उन्होंने ‘भीख मांगती माँ’ कविता में एक माँ की करुणा को सृजित किया है जिसमें लोग निर्जीव मूर्ति पर छप्पन भोग लगाते हैं परन्तु एक लाचार बूढी औरत को कोई एक नज़र भर देखता तक नहीं। इसके साथ साथ लेखिका ने बहुजन महापुरुषों जिसमें तथागत गौतम बुद्ध, सम्राट अशोक, ज्योतिबा फूले, बाबा साहेब डॉ.भीमराव अम्बेडकर, कांशीराम जी की स्मृतियों को जीवन्त रूप दिया है। उनके संघर्षों और महान कार्यों को उकेरा है जो हमें सिखाते हैं कि कोई भी कार्य मुश्किल नहीं है उसे करने का दिल में साहस, धैर्य, सहनशीलता और त्याग होना जरूरी है।

‘हुआ कोरोना बे-लगाम’, ‘देश के दर्द-ए-बयां’ और ‘कोरोना महामारी’ जैसी रचनाओं में देश के हालातों पर एक नज़र डाली है। ‘देश की शान’ कविता ने किसानों को देश में सर्वोपरि बताया है और होना भी चाहिए क्योंकि कृषि प्रधान देश की अर्थव्यवस्था खासकर कृषि पर ही निर्भर है। ‘रावण’ कविता बलात्कारियों पर तीखा कटाक्ष करती है और उन पर भी कटाक्ष किया है जो बेटी बचाने का कोरा दिखावा करते हैं। मतदाताओं को कटघरे में खड़ा करती बेबाक लेखनी ‘मुझे अच्छा नहीं लगता’। हम बता दें ‘मोम की मानिंद’ कविता जो इस पुस्तक का शीर्षक है, में माँ-बाप के उपकार संजोये हैं कि किस प्रकार उनके उपकारों को भूलकर उनकी सन्तानें उन्हें वहीं रखकर आगे बढ़ जाती है जहाँ उन्होंने अपनी सन्तानों को सींचा था।

‘जीवन ही संघर्ष है’ कविता हमें बताती है कि संघर्ष के बिना जीवन में कुछ भी हासिल करना मुमकिन नहीं है। रचना ‘अर्धांगिनी के प्रश्न’ में नारी की पीड़ा को उजागर किया है पुरुषप्रधान देश में उसे किस प्रकार हेय दृष्टि से देखा जाता है उसी पर सवाल करता मार्मिक सृजन हुआ है और ‘RIP महिला आयोग’ में आयोग पर व्यंग्य किया है जो महिलाओं के हकों के लिए लड़ता जरूर है पर जातिवाद के दलदल में खोखला हो गया है। ‘नन्ही सी जान’ कविता नवशिशु की अठखेलियों के भाव दर्शाती है। ‘माँ का प्यार’ और ‘माँ” कविता जगत जननी माँ को समर्पित उम्दा भाव प्रस्तुत करती हैं तो वही ‘बरखा रानी’ बारिश का सुंदर चित्रण पेश करती है। ‘अधिकार’, ‘कांशीराम की स्मृति है आई’, ‘सलाम सिंबल ऑफ़ नॉलेज’, ‘राष्ट्रपिता ज्योतिबा की ज्योति’, ‘भीमदूत कांशीराम’, ‘कुर्बान अपने अरमान’ और ‘महान अशोक हो गया’ कविताएँ महापुरुषों के संघर्षों को दर्शाती हुई पाठकों को अच्छा सन्देश देती हैं। महापुरुषों में एक पुरुष ऐसे भी थे जिनके चेहरे के पीछे एक दूसरा चेहरा भी छिपा था जिसे भारत का राष्ट्र पिता कहा जाता है पर असलियत छिपे नहीं छिपती, उनपर कवयित्री ने बड़ी बेबाकी से ‘महात्मा ऐसे भी’ कविता सृजन कर शानदार व्यंग्य कसा है। इन कविताओं को पढ़कर पाठक ये तो समझ ही जाएगा कि लेखिका काल्पनिक चित्रण पर कम और यथार्थ पर अधिक जोर देती है।

‘मलीनता’, ‘हमारी जाति’, ‘तुम्हारी मूंछ नीची’, ‘चेहरे पे चेहरा’, ‘कितना सताया है’, जैसी रचनाओं से कवयित्री ने पाखंडवाद,जातिवाद जैसी घिनौनी मानसिकताओं पर करारा तमाचा जड़ा है इन रचनाओं को पढ़कर निसन्देह पाठक समझ जाएगा कि आजाद भारत में आज भी निम्न वर्ग जातिवाद और गुलामी से घिरा हुआ है वहीं दूसरी ओर ‘संविधान गीत’ ने बेहतरीन सन्देश दिया है। होलिका की कहानी सब जानते हैं उसी का उदाहरण देकर ‘दरिंदगी’ में लेखिका ने समसामयिक हालातों पर एक नज़र डाली है।

लेखिका ने एक तरफ अगर ‘माँ का दर्द’ में देशभक्ति के भाव दर्शाएं हैं ‘मानसिकता’, ‘लड़कियों’, ‘बेटियों की दशा’, ‘मजबूर स्त्री’ कविताओं में नारी की पीड़ा और संघर्षों को बयां किया है और ‘श्रृंगार या गुलामी’ में पुरुषों की महिलाओं के प्रति जो कुटिल मानसिकता है उस पर करारी चोट पहुँचाई है या यूँ कहें स्त्री विमर्श पर कलम चलाई है तो वहीं दूसरी तरफ उन्होंने ‘पिता की कुर्बानी’ में एक पुरुष की पीड़ा और संघर्ष को भी दर्शाया है और ‘दहेज एक्ट का दुरूपयोग’ में महिला किस प्रकार अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर घरेलू हिंसा को बढ़ावा देती है, को बेबाकी से बताया है। साफ़ शब्दों में कहें तो लेखिका ने कहीं पर भी लिंग भेदभाव सा व्यवहार नहीं किया है। ‘मैं गरीब हूँ’ कविता पढ़कर पाठक का ह्रदय द्रवित हो सकता है क्योंकि इसमें कोरोना जैसी विपरीत परिस्थिति में गरीब की पीड़ा का मार्मिक चित्रण किया है जो अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता पर प्रहार करता है। ‘दिलफेंक आशिकों से’ रचना आज की युवा पीढ़ी पर तंज कसती हुई प्रतीत होती है जो प्यार के जाल में फंसकर ओछी हरकतों से बाज नहीं आती। ‘त्यो+हार (तुम्हारी हार)’ रचना बताती है कि भेड़ चाल का हिस्सा न बनकर यथार्थ पर ध्यान दिया जाए तो पाखंडवाद से छुटकारा पा सकते हैं। ‘द्रोण की कुटिलता’ इस कविता के माध्यम से कवि ने समाज में व्याप्त कुरीतियों को उजाकर करने का प्रयत्न किया है कि किस तरह निम्न वर्ग के होनहारों को भी सदियों से सिर्फ जाति के कारण पीछे धकेल दिया जाता रहा है।

इस काव्य संग्रह के सारांश की बात करें तो लेखिका ने हर विषय पर अपनी कलम बेबाकी से चलाई है जिसमें स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, जातिवाद, पाखंडवाद और घरेलू हिंसाओं जैसे विषय अहम रहे हैं। चूँकि उनके काव्य संग्रह को बेहद उम्दा तो नहीं कह सकते परन्तु निसन्देह ये एक बेहतरीन कृति है जो पाठकों को हताश या निराशा जैसे भाव नहीं लाएगी। शानदार कृति ‘मोम के मानिंद’ पाठकों को सुपुर्द किया है वाकई में लेखिका ने इस काव्य संग्रह के माध्यम से समाज को समानता, पाखण्ड मुक्त भारत और सत्यता की राह दिखाई है। इस रचना संग्रह के लिए लेखिका बधाई की पात्र है। साहित्य का शिखर फ़तह करे ऐसी मंगलकामनाएँ।

काव्य संग्रह - मोम की मानिंद पुस्तक समीक्षा
©®✍️अरविन्द कालमा
भादरूणा, साँचोर (राजस्थान)

 


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