Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem, Siddharth_Gorakhpuri

कविता – बे-परवाह जमाना

कविता – बे-परवाह जमाना ये मन अक्सर बुनता रहता है ,ख्वाबों का ताना बाना ।दिल भी अक्सर छेड़े रहता है …


कविता – बे-परवाह जमाना

ये मन अक्सर बुनता रहता है ,ख्वाबों का ताना बाना ।
दिल भी अक्सर छेड़े रहता है ,एक अल्हड़ सा तराना।

अभी तो गुमसुम सा रहता हूँ इक छोटी सी उम्मीद लिए,
के एक दिन मुझको ढूंढ ही लेगा ,ये बे- परवाह जमाना।

जिन्दगी अक्सर रह जाती है ,अनसुना सा किस्सा बनकर।
हम भी तो रह जातें है केवल, एक छोटा हिस्सा बनकर।

कब आए कब चले जाना है ,नही कोई ठौर ठिकाना।
के एक दिन मुझको ढूंढ ही लेगा ,ये बे- परवाह जमाना।

जिन्दगी रह – रह कर ,कितने लम्हों को चुनती है।
वही पुरानी यादों से ,ख्वाबों के जाले बुनती है।

मेरे आंखों में आँसू होंगे ,गर किस्सा पड़ा सुनाना।
के एक दिन मुझको ढूंढ ही लेगा ,ये बे- परवाह जमाना।

बक्शीस में गर ख़ुशी मिले और ढेरों सारा प्यार मिले।
जब -जब कोई दुआएँ दे ,मुझे ये लम्हा हरबार मिले।

गर ऐसे दुआएँ मिलती रहे ,आसान हो दुख को हराना।
के एक दिन मुझको ढूंढ ही लेगा ,ये बे- परवाह जमाना।

About author

-सिद्धार्थ गोरखपुरी

-सिद्धार्थ गोरखपुरी


Related Posts

क्या लेकर आया है जो ले जायेगा

June 24, 2022

 क्या लेकर आया है जो ले जायेगा सुधीर श्रीवास्तव यह कैसी विडम्बना है कि हम सब जानते हैं मगर मानते

अनंत यात्रा

June 24, 2022

 अनंत यात्रा सुधीर श्रीवास्तव शून्य से शिखर तक जीवन की गतिमान यात्रा खुद को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर होने का दंभ

कदम

June 24, 2022

 कदम सुधीर श्रीवास्तव हमें लगता है कि हमारे कदम किसी और को  प्रभावित नहीं करते , पर सच तो यह

व्यंग्य स्वार्थ के घोड़े

June 24, 2022

 व्यंग्यस्वार्थ के घोड़े सुधीर श्रीवास्तव आजकल का यही जमाना अंधे को दर्पण दिखलाना, बेंच देते गंजे को कंघा देखो! कैसा

डरने लगा हूँ मैं

June 24, 2022

 डरने लगा हूँ मैं सुधीर श्रीवास्तव वो छोटा होकर  कितना बड़ा हो गया है, बड़ा होकर भी बहुत छोटा हो

परिस्थितियां

June 24, 2022

 परिस्थितियां सुधीर श्रीवास्तव जीवन है तो परिस्थितियों से दो चार होना ही पड़ता है, अनुकूल हो या प्रतिकूल हमें सहना

PreviousNext

Leave a Comment