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कविता – न मिला

कविता – न मिला एक उम्र खरच कर कुछ न मिलातुमको क्या पता सचमुच न मिलाक्या हुआ है कोई धरती …


कविता – न मिला

एक उम्र खरच कर कुछ न मिला
तुमको क्या पता सचमुच न मिला
क्या हुआ है कोई धरती पर
के जिसको थोड़ा भी दुःख न मिला

अपार हर्ष के साथ सहर्ष
निज आगमन को स्वीकार किया
कुछ ही सपनों का जीवन में
फिर से जीर्णोद्धार किया
धीरज को जेहन तक ले जाए
ऐसा कोई सम्मुख न मिला
क्या हुआ है कोई धरती पर
के जिसको थोड़ा भी दुःख न मिला

जीवन में हर दिन बाधा लेकर
कभी पूरा तो कभी आधा लेकर
आदमी सुखी रहा है कभी?
कम या थोड़ा ज्यादा लेकर
आदमी कभी तृप्त हुआ ही नहीं
फिर कैसे कहे के कलुष न मिला
क्या हुआ है कोई धरती पर
के जिसको थोड़ा भी दुःख न मिला

आदमी क्या कभी निर्विवाद रहा
क्या जीवन भर वो आबाद रहा
जिसे भूल गया उसे याद किया
जो भूल गया उसे याद रहा
फिर जीवन भर ये खेल चला
और मानुष को भल मानुष न मिला
क्या हुआ है कोई धरती पर
के जिसको थोड़ा भी दुःख न मिला

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-सिद्धार्थ गोरखपुरी

-सिद्धार्थ गोरखपुरी


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