Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Bhaskar datta, poem

कविता –छात्र नेता, गोली और हत्या |kavita

” छात्र नेता, गोली और हत्या “ मैं नहीं कहता कि मुझे अपने ही मारेंगेमुझे अपनों पर पूरा भरोसा हैतब …


” छात्र नेता, गोली और हत्या “

मैं नहीं कहता कि मुझे अपने ही मारेंगे
मुझे अपनों पर पूरा भरोसा है
तब दुश्मनों की औक़ात ही क्या
जब घर ही जयचंदो का है
जिसकी आवाज़ सुनकर कांपते थे
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रत्येक छात्रनेता,
हर एक गली में गूंजता था नाम
अच्युतानन्द उर्फ़ सुमित शुक्ला
आखिर वह प्रयागराज में स्तब्ध क्यों हो गया?
तब धरती के गहन अंधकार स्वर में
एक लहर प्रतिध्वनित हो उठती है
कि “पहले राजनीति के लिए हत्या होती थी
और अब हत्या के लिए राजनीति… “
उसकी तस्वीर तो देखिए जनाब़
गोली खाकर भी आजाद ए चंद्रशेखर
अल्फ्रेड पार्क का हिंदुस्तानी राजा
जिसे देखकर जयचंदों का स्तन
दूध की जगह पानी का संगम बन बैठा
कि कहीं ये खूंखार शेर उठ न जाये
और तब हमारी छत्रछाया कौन बनेगा,
हम किसकी शरण में सुरक्षित होंगें?
लेकिन वह वीर तो जैसे सो गया हो
अपनी राजशाही मुद्रा में,
जिसे उसकी ही पिस्टल से
उसे मार दिया गया था
और अब वह विदा ले रहा था
आसमानी तारों का नया सूर्य बनने के लिए
क्योंकि ‘भास्कर’ बनकर वह देख सकता है
प्रयागराज के नवनिर्वाचित परीक्षित को,
जिसका पूर्वज कभी जयचंद होता था….!

About author

भास्कर दत्त शुक्ल  बीएचयू, वाराणसी
भास्कर दत्त शुक्ल
 बीएचयू, वाराणसी

Related Posts

कविता -आँखें भी बोलती हैं

June 23, 2022

 कविता -आँखें भी बोलती हैं सिद्धार्थ गोरखपुरी न जीभ है न कंठ है कहने का न कोई अंत है दिखने

कविता -गँवईयत अच्छी लगी

June 23, 2022

 कविता -गँवईयत अच्छी लगी सिद्धार्थ गोरखपुरी माँ को न शहर अच्छा लगा न न शहर की शहरियत अच्छी लगी वो

कविता – बचपन पुराना रे

June 23, 2022

 कविता – बचपन पुराना रे सिद्धार्थ गोरखपुरी ढूंढ़ के ला दो कोई बचपन पुराना रे पुराना जमाना हाँ पुराना जमाना

ये ख्वाब न होते तो क्या होता?

June 23, 2022

 कविता – ये ख्वाब न होते तो क्या होता? सिद्धार्थ गोरखपुरी झोपड़ी में रहने वाले लोग जब थोड़े व्यथित हो जाते

रक्त की बूँद!!!!

June 23, 2022

 रक्त की बूँद!!!! अनिता शर्मा रक्त की हर बूंद कीमती,रक्तदान जरूरी है।कीमती हर जान रक्त से,रक्त दान जरूरी है। समय-समय

“श्रृंगार रस”

June 22, 2022

 “श्रृंगार रस” वो लम्हा किसी नाज़नीन के शृंगार सा बेइन्तहाँ आकर्षक होता है, जब कोई सनम अपने महबूब की बाँहों

PreviousNext

Leave a Comment