Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

कविता – छाँव सा है पिता

 कविता – छाँव सा है पिता सिद्धार्थ गोरखपुरी गलतफहमी है के अलाव सा है पिता घना वृक्ष है पीपल की …


 कविता – छाँव सा है पिता

सिद्धार्थ गोरखपुरी
सिद्धार्थ गोरखपुरी

गलतफहमी है के अलाव सा है पिता

घना वृक्ष है पीपल की छाँव सा है पिता

लहजा थोड़ा अलग होता है माना

पर प्रेम अंतस में लबालब भरा है

अपने परिवार के खातिर है मीलों दूर

वो बुरे हालातों से कब डरा है

बच्चे मझधार में हों तो नाँव सा है पिता

घना वृक्ष है पीपल की छाँव सा है पिता

माँ की ममता और पिता का साया

ये दो बल हैं जो सम्बल देते हैं

दुआएं,आशीर्वाद,डांट -फटकार

ऐसे आशीष हैं के किस्मत बदल देते हैं

हर दौर में हाथ थामने वाला गाँव सा है पिता

घना वृक्ष है पीपल की छाँव सा है पिता

हैसियत से ऊँचा उठता है बच्चों के लिए

जंग वक़्त से रह -रह कर लड़ता है

मुसीबतों का पहाड़ भी ग़र टूट पड़े

पिता है मुसीबतों से कहाँ डरता है

मुसीबतें नदी हैं तो समंदर के ठहराव सा है पिता

घना वृक्ष है पीपल की छाँव सा है पिता

-सिद्धार्थ गोरखपुरी


Related Posts

अकेला!-डॉ. माध्वी बोरसे

January 7, 2022

अकेला! दुख में हमेशा इंसान अकेला होता है, सुख में दुनिया उसके साथ होती है! उत्साह के लिए इंसान हमेशा

पधारो म्हारो राजस्थान-डॉ. माध्वी बोरसे!

January 7, 2022

पधारो म्हारो राजस्थान! जीवंत संस्कृति, रेतीली मरुस्थलीय भूमि,  ऊंट पर बैठकर सवारी,  जब ये यादे मानस पटल पर आती,रखता है

मसूरी-जन्नत सा शहर-डॉ. माध्वी बोरसे!

January 7, 2022

मसूरी-जन्नत सा शहर! मसूरी भारत देश के उत्तराखंड राज्य का एक पर्वतीय नगर, बहुत सुहावने मौसम का अनुभव देती है

चाह-तेज देवांगन

January 7, 2022

शीर्षक – चाह हम जीत की चाह लिए,गिरते, उठते पनाह लिए,निकल पड़े है, जीत की राह में,चाहे कंटक, सूल, खार

हे नववर्ष!-आशीष तिवारी निर्मल

January 6, 2022

हे नववर्ष! तुम भी दगा न करना आओ हे नववर्ष!तुम हमसे कोई दग़ा न करना बीते जैसे साल पुराने वैसी

लाऊं तो कैसे और कहां से-जयश्री बिरमी

January 6, 2022

लाऊं तो कैसे और कहां से कहां से लाऊ वो उत्साह जो हर साल आता थाकहां से लाऊं वह जोश

Leave a Comment