Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

कविता -गँवईयत अच्छी लगी

 कविता -गँवईयत अच्छी लगी सिद्धार्थ गोरखपुरी माँ को न शहर अच्छा लगा न न शहर की शहरियत अच्छी लगी वो …


 कविता -गँवईयत अच्छी लगी

सिद्धार्थ गोरखपुरी
सिद्धार्थ गोरखपुरी

माँ को न शहर अच्छा लगा न

न शहर की शहरियत अच्छी लगी

वो लौट आई गाँव वाले बेटे के पास

के उसे गाँव की गँवईयत अच्छी लगी

ममता भी माँ से थोड़ी अनजान हो गई

माँ शहर वाले बेटों के यहाँ जब मेहमान हो गई

गाँव वाला बेटा जब ले आया माँ को घर,

तो गलियाँ, खिड़कियां, नीम की छइयाँ

सब के सब मकान हो गईं

माँ को उसके मन की वसीयत अच्छी लगी

वो लौट आई गाँव वाले बेटे के पास

के उसे गाँव की गँवईयत अच्छी लगी

खुदा ने खुद को जब खुद सा बनाना चाहा

उसने ये प्रयोग हर माँ पर आजमाना चाहा

वो जानता था के माँ उससे भी बड़ी है

बस इस बात को दुनिया को बताना चाहा

उसे हर एक दौर में माँ की नीयत अच्छी लगी

वो लौट आई गाँव वाले बेटे के पास

के उसे गाँव की गँवईयत अच्छी लगी

शहर और गाँव का ताल्लुक उसे अब अच्छा नहीं लगता

शहर का बच्चा भी अब उसे बचपने से बच्चा नहीं लगता

उसके कान में मन ने ऐसी बात कह दी के, 

न उसे आदमी अच्छा लगा न उसकी कैफियत अच्छी लगी

वो लौट आई गाँव वाले बेटे के पास

के उसे गाँव की गँवईयत अच्छी लगी

-सिद्धार्थ गोरखपुरी


Related Posts

अजय प्रसाद की रचनाएं

March 26, 2022

अजय प्रसाद की रचनाएं  हमसे हमारे ख्वाब न छीन काँटों भरी गुलाब न छीन ।जिंदा तो हूँ गफलत में सहीयादों

मेरा मन है एक बंजारा- वीना आडवाणी तन्वी

March 26, 2022

मेरा मन है एक बंजारा मेरा मन है एक बंजारा स्थिर नहीं ये फिरता मारामाराकभी प्राकृतिक सौंदर्य में फिरेतो कभी

हौंसले-जयश्री बिरमी

March 25, 2022

हौंसले एक सुंदर नारीचल पड़ी गगन विहारीथा उसे उडना बहुतदूर दूर क्षितिज से भी दूरपंख थे छोटे और कोमलपार करेगी

जब वक्त थम सा गया-जयश्री बिरमी

March 25, 2022

जब वक्त थम सा गया एक बार ही मिली नजरें तो दिल उसी पर आ गयामिलने के लिए उसी से

दिल ढूँढता है-नंदिनी लहेजा

March 25, 2022

दिल ढूँढता है कहाँ गए बचपन के वो दिन,जो निश्चिंतता में गुजरते थे।ना लोभ था,ना कोई कपट,निश्छलता लिए रहते थे।दिल

कवि का ह्रदय है – नंदिनी लहेजा

March 25, 2022

शीर्षक-कवि का ह्रदय है  कवि का ह्रदय है खजाना विचारों का , कविता हैं उसकी कुंजी।हँसाते, रुलाते,कभी दिल को छू

Leave a Comment