Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem, Siddharth_Gorakhpuri

कविता – उलझ जाता हूँ मैं

कविता – उलझ जाता हूँ मैं किसी से बात कहनी होकिसी की बात सुननी होमानवता और मुझमें सेअगर मेरी जात …


कविता – उलझ जाता हूँ मैं

किसी से बात कहनी हो
किसी की बात सुननी हो
मानवता और मुझमें से
अगर मेरी जात चुननी हो
कुछ समझ नहीं आता,बस उलझ जाता हूँ मैं

किसी से इजहार करना
किसी से प्यार करना हो
इस मतलबी दुनियाँ में
किसी पर ऐतबार करना हो
कुछ समझ नहीं आता, बस उलझ जाता हूँ मैं

वायदे याद रखने हों
कायदे याद रखने हों
कुछ करने से पहले
फायदे याद रखने हों
कुछ समझ नहीं आता, बस उलझ जाता हूँ मैं

किसी को अपना बनाना हो
किसी से मिलने जाना हो
वैसे सोचता भी हूँ
इन सब का क्या बहाना हो
कुछ समझ नहीं आता बस उलझ जाता हूँ मैं

About author

-सिद्धार्थ गोरखपुरी

-सिद्धार्थ गोरखपुरी


Related Posts

जो कम लोग देख पाते हैं

June 24, 2022

 जो कम लोग देख पाते हैं जितेन्द्र ‘कबीर’ आग लगाई गई… ज्यादातर लोगों ने उसमे जलती देखी गाड़ियां, भवन और

धारा के विपरीत

June 24, 2022

 धारा के विपरीत जितेन्द्र ‘कबीर’ शक्तिशाली का गुणगान करना फायदे का सौदा रहा है हमेशा से, यह जानते हुए भी

अस्तित्व इतिहास बनेगी

June 24, 2022

 अस्तित्व इतिहास बनेगी सुधीर श्रीवास्तव पृथ्वी दिवस की औपचारिकता न निभाइए भू संरक्षण करना है तो  धरातल पर कुछ करके

यही जीवन चक्र है

June 24, 2022

 यही जीवन चक्र है सुधीर श्रीवास्तव जीवन क्या है यह समझाने नहीं खुद समझने की जरूरत है, अदृश्य से जीवन

व्यंग्य धरती को मरने दो

June 24, 2022

 व्यंग्यधरती को मरने दो सुधीर श्रीवास्तव धरती उपज को रही तो खोने दो धरती मर रही है मरने दो। बहुत

जब तक है जिंदगी

June 24, 2022

 जब तक है जिंदगी सुधीर श्रीवास्तव जिंदगी जब तक है गतिमान रहती है, न ठहरती है,न विश्राम करती है। सुख

PreviousNext

Leave a Comment