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कविता – उलझ जाता हूँ मैं

कविता – उलझ जाता हूँ मैं किसी से बात कहनी होकिसी की बात सुननी होमानवता और मुझमें सेअगर मेरी जात …


कविता – उलझ जाता हूँ मैं

किसी से बात कहनी हो
किसी की बात सुननी हो
मानवता और मुझमें से
अगर मेरी जात चुननी हो
कुछ समझ नहीं आता,बस उलझ जाता हूँ मैं

किसी से इजहार करना
किसी से प्यार करना हो
इस मतलबी दुनियाँ में
किसी पर ऐतबार करना हो
कुछ समझ नहीं आता, बस उलझ जाता हूँ मैं

वायदे याद रखने हों
कायदे याद रखने हों
कुछ करने से पहले
फायदे याद रखने हों
कुछ समझ नहीं आता, बस उलझ जाता हूँ मैं

किसी को अपना बनाना हो
किसी से मिलने जाना हो
वैसे सोचता भी हूँ
इन सब का क्या बहाना हो
कुछ समझ नहीं आता बस उलझ जाता हूँ मैं

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-सिद्धार्थ गोरखपुरी

-सिद्धार्थ गोरखपुरी


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