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ईमानदारी कविता -जयश्री बिरमी

ईमानदारी कहां कहां ढूंढू तुझे बता दे जराढूंढा तुझे गांव गांव और गली गलीढूंढने के लिए तुझे मैं तो शहर …


ईमानदारी

ईमानदारी

कहां कहां ढूंढू तुझे बता दे जरा
ढूंढा तुझे गांव गांव और गली गली
ढूंढने के लिए तुझे मैं तो शहर को चली
दुकानों में ढूंढा दफ्तरों में भी ढूंढा
गई मैं विद्यालय और महाविद्यालय भी
अब बताओं कहां और ढूंढू तुम्हे
किसी के दिल में भी न मिली
न ही मिली दिमाग में कीसीके
नहीं दिखी किसी के व्यवहार और परिवार में
आस पड़ोस में भी न मिली
देखा मैंने रब के द्वार पर भी
और ढूंढा कहां कहां नहीं
हार कर पहुंची न्याय के द्वारे
और पहुंची नेताओं के घर भी
अब तो तू ही बता दे ए परदा नशीं
ढूंढू मैं तुझे तू कह दे वहीं
अब हुई बहुत मिन्नते बता दे
तू प्यार से ए ’ईमानदारी’
हस्ती तेरी किस जगह हैं
अब तो ढूंढ कर थक चुकी हूं
पक चुकी तेरे ही इंतजार में
अब बताएं दे जालिम हस्ति तेरी कहां हैं ए ईमानदारी….. तेरी

जयश्री बिरमी
अहमदाबाद


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