Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

विजय : एंग्री यंग मैन के 50 साल

विजय : एंग्री यंग मैन के 50 साल अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘जंजीर’ 11 मई, 1973 को रिलीज हुई थी। …


विजय : एंग्री यंग मैन के 50 साल

विजय : एंग्री यंग मैन के 50 साल | Vijay: 50 Years of the Angry Young Man

अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘जंजीर’ 11 मई, 1973 को रिलीज हुई थी। इस महीने इस ‘घटना’ को 50 साल हो गए। ‘घटना’ इसलिए कि इस फिल्म की अनापेक्षित सफलता की वजह से नए एक्टर अमिताभ बच्चन के कैरियर और व्यक्तिगत जीवन की शुरुआत हुई थी। ‘जंजीर’ रिलीज हुई, उसके 8 दिन पहले अमिताभ और जया भादुड़ी (जंजीर में उनकी सह कलाकार) का विवाह हुआ था। वह भी पिता हरिवंशराय बच्चन की वजह से। ‘जंजीर’ की शूटिंग पूरी होने की खुशी में अमिताभ और जया घूमने के लिए विदेश जाना चाहते थे। तब सीनियर बच्चन ने टोका था कि बिना विवाह के बाहर नहीं जाया जा सकता।
दूसरी ओर ‘जंजीर’ की वजह से हिंदी फिल्मों का प्रवाह बदल गया था। एक्शन फिल्में तो इसके पहले भी बनी थीं, पर ‘जंजीर’ के एग्री यंग मैन के कारण फिल्म निर्माताओं को नए तरह का हीरो मिला था, जो इसके बाद अनेक फिल्मों में अलग-अलग स्वरूप में देखने को मिला। जैसे कि ‘घायल’ में सनी देओल पर, ‘अर्धसत्य’ के ओम पुरी पर, ‘डर’ में शाहरुख खान पर, ‘सत्य’ में मनोज बाजपेई पर, ‘गंगाजल’ में अजय देवगन पर, ‘राख’ में आमिर खान पर और ‘तेजाब’ में अनिल कपूर पर ‘जंजीर’ के विजय का प्रभाव था।
‘जंजीर’ एक ऐसी फिल्म थी, जिसने हिंदी सिनेमा की शक्ल बदल दी थी। ‘जंजीर’ के विजय का पहला विचार सलीम खान और जावेद अख्तर को आया था। इनकी जोड़ी चार फिल्मों और दो साल पुरानी थी। 1971 में ‘अंदाज’, ‘अधिकार’, ‘हाथी मेरे साथी’ और 1972 में ‘सीता और गीता’। दोनों फिल्म जगत में चप्पलें घिस रहे थे। इनके पास नए-नए आइडिया बहुत थे। हालीवुड की फिल्मों बाउंड- स्क्रिप्ट्स का अध्ययन करने के पहले ये लेखक थे। उस समय हिंदी फिल्मों में लेखकों को जरा भी महत्व नहीं दिया जाता था। मुंबई में ‘जंजीर’ के पोस्टर लगे थे तो सलीम-जावेद ने कुछ लोगों की मदद लेकर ‘रिटेन बाई सलीम-जावेद’ लिख दिया था। इसके बाद ऐसा समय आया कि फिल्म के नाम की अपेक्षा सलीम-जावेद का नाम मोटे अक्षरों में लिखा जाता था। फिल्म लेखकों को सम्मान और पैसा सलीम-जावेद की ही वजह से मिलने लगा था।
‘जंजीर’ मूलरूप से शेरखान (प्राण) की फिल्म है। पठान के चरित्र के लिए प्राण को पहले से ही पसंद कर लिया गया था। हीरो (अमिताभ) की खोज तो बाद में हुई थी और इसमें भी प्राण के कहने पर ही अमिताभ को लिया गया था। वास्तव में सलीम ने एक ऐसे पठान का चरित्र रचा था, जो हीरो के समकक्ष था। जैसे ‘सत्या’ में मूल हीरो जे.डी.चक्रवर्ती है (फिल्म उसी के नाम पर है), पर भीखू महानेत्री की भूमिका में मनोज बाजपेई उस पर छा गए, उसी तरह ‘जंजीर’ में शेरखान एक ऐसा समांतर हीरो था, जो काम तो गैरकानूनी करता है, पर दिल से ईमानदार इंसान है। इस भूमिका में प्राण को लेने की वजह यह थी कि वह एक जानेमाने एक्टर थे और अमिताभ एक अंजाना नाम था। यह पहली फिल्म है, जिसमें हीरो के हिस्से में एक भी गाना नहीं है। पर शेरखान के नाम पर ‘यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी’ लोकप्रिय गाना है। ज्यादातर दमदार संवाद भी उसी के हिस्से में हैं। जैसे कि ‘आज जिंदगी में पहली बार शेरखान की किसी शेर से टक्कर हुई है’ अथवा ‘शेरखान किसी शेर का शिकार नहीं करता। वैसे भी हमारे मुल्क में अब शेर कम रह गए हैं’ अथवा ‘एक इंसपेक्टर की जान की कीमत पचास हजार रुपैया? मालूम होता है बड़ा ईमानदार होगा’।
‘जंजीर’ फिल्म से खलनायकों का चेहरा बदल गया। सेठ धरमदास तेजा पहला खलनायक था, जो शूट-टाई पहनता था, सिगार फूंकता था, अंग्रेजी और वह भी नीची, प्रेमिल आवाज में बोलता था। उसी साल आई ‘यादों की बारात’ में भी इन्होंने शाकाल के चरित्र को रचा था। इन फैक्ट सलीम-जावेद को हीरो की अपेक्षा विलेन में ज्यादा रुचि होती थी। उनके एंग्री यंग मैन में भी ये सारे लक्षण थे, जो एक खलनायक में थे। इसलिए उन्हें एंटी हीरो भी कहते हैं।
‘जंजीर’ का विजय सिस्टम से त्रस्त था। कुछ हद तक 70 के दशक के भारत में लोग राजनीतिक और प्रशासनिक सिस्टम से परेशान थे। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, गरीबी और कालाबाजारी जोरों पर थी। जिन आदर्शों के लिए आजादी प्राप्त हुई थी, वे कोने में रख दिए गए थे। हिंदी सिनेमा में उस समय राजेश खन्ना के रोमांटिसिज्म का दौर था, पर सामाजिक परेशानियों से त्रस्त युवा का उनसे लगाव खत्म हो रहा था। सलीम-जावेद भी अन्याय और बेकारी के दौर से गुजरे थे। उनके अंदर भी वैसा ही गुस्सा और नाराजगी थी, जो उस समय की पीढ़ी में थी।
इन फैक्ट ‘जंजीर’ से ठीक पहले की ‘हाथी मेरे साथी’ में पैसे में उनके साथ अन्याय किया गया था और इसे लेकर झगड़ा भी हुआ था। यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सलीम-जावेद ने खीझ कर ‘जंजीर’ की स्क्रिप्ट लिखी थी। उस समय के तमाम स्थापित हीरो (दिलीप कुमार, धर्मेन्द्र, देव आनंद, राजकुमार) ने ‘जंजीर’ करने से मना कर दिया था। क्योंकि विजय में हीरो के लक्षण नहीं थे। यह सलीम-जावेद की जिद थी कि प्रकाश मेहरा नवोदित अमिताभ को लें। कुछ हद तक अमिताभ भी अपनी नाकामी से त्रस्त थे। राजेश खन्ना के अहंकार का वह भी शिकार हो चुके थे। जो लावा सलीम-जावेद में था, वही लावा उनके अंदर भी था। आखिर विजय की भूमिका में वह परदे पर अवतरित हो गए। 70 के युवा दर्शकों को तुरंत उनकी हताशा विजय में दिखाई दी।
‘जंजीर’ का विजय समाज की गंदगी दूर करने के लिए बेचैन था। इसके लिए वह सिस्टम से बाहर जाकर काम कर रहा था और दर्शकों को यही अच्छा लगा था। दर्शक भी सिस्टम से हताश थे। उनके सामने पहली बार एक ऐसा हीरो था, जिसके पास न तो हीरोइन से रोमांस करने का समय था, न तो अपने काम के बदले नौकरी गंवाने का डर। न तो वह देव आनंद की तरह साॅफिस्टिकेटेड था, न तो राजेश खन्ना जैसा कोमल। वह एकदम नए तरह का हीरो था। उसमें विद्रोह था। अमिताभ ने विजय की भूमिका के साथ पूरा न्याय किया था। दर्शकों के लिए अमिताभ सरप्राइज थे। वे तो शेरखान को देखने थिएटर में गए थे और बाहर आए तो विजय को लेकर आए थे।
प्रकाश मेहरा का यह विजय अमिताभ बच्चन और हिंदी सिनेमा को हमेशा के लिए बदल देने वाला था।

About author 

वीरेन्द्र बहादुर सिंह जेड-436ए सेक्टर-12, नोएडा-201301 (उ0प्र0) मो-8368681336

वीरेन्द्र बहादुर सिंह
जेड-436ए सेक्टर-12,
नोएडा-201301 (उ0प्र0)


Related Posts

स्वयं के जीवन के निर्णय स्वयं से लीजिए!/swayam ke jeevan ke nirnay swayam se lijiye

July 23, 2022

 स्वयं के जीवन के निर्णय स्वयं से लीजिए!/swayam ke jeevan ke nirnay swayam se lijiye  हम सभी को आम तौर

Draupadi murmu ka mayurganj se rastrpati bhawan tak ka safar

July 22, 2022

द्रौपदी मुरमू का मयूर गंज से राष्ट्रपति भवन तक का सफर यशवंत सिन्हा का एक टीवी चैनल पर साक्षात्कार सुना

हार न मानने की जिद ने पैदा किया कवि और पायी परिस्थितियों पर जीत।

July 21, 2022

हार न मानने की जिद ने पैदा किया कवि और पायी परिस्थितियों पर जीत। ‘तितली है खामोश’ से सत्यवान ‘सौरभ’

एक मजबूत, शक्तिशाली और विकासशील भारत।/ek majboot shaktishali aur vikassheel bharat

July 19, 2022

 एक मजबूत, शक्तिशाली और विकासशील भारत। (उदीयमान प्रबल शक्ति के बावजूद भारत अक्सर वैचारिक ऊहापोह में घिरा रहता है. यही

अत्यधिक ऑनलाइन गेमिंग बच्चों की शिक्षा और सोच पर डाल रही हानिकारक प्रभाव।

July 18, 2022

 अत्यधिक ऑनलाइन गेमिंग बच्चों की शिक्षा और सोच पर डाल रही हानिकारक प्रभाव। सरकार बच्चों के लिए ऑनलाइन गेमिंग घंटे

क्यों वेतनभोगी दुधारू गाय कर के लिए बार-बार दूध दुही जाती है?

July 16, 2022

  क्यों वेतनभोगी दुधारू गाय कर के लिए बार-बार दूध दुही जाती है? प्रियंका ‘सौरभ’ (आखिर एक तनख्वाह से, कितनी

Leave a Comment