Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Dr_Madhvi_Borse, poem

लोहड़ी का पर्व- डॉ. माध्वी बोरसे

लोहड़ी का पर्व! फसल की कटाई और बुआई के तौर पर मनाया जाता है यह त्योहार,सब नए नए वस्त्र पहनकर, …


लोहड़ी का पर्व!

लोहड़ी का पर्व- डॉ. माध्वी बोरसे

फसल की कटाई और बुआई के तौर पर मनाया जाता है यह त्योहार,
सब नए नए वस्त्र पहनकर, संध्याकाल में हो जाते है तैयार,
किसान उत्सव के रूप में लोहड़ी का पर्व मनाते,
आग जलाकर सभी, आग के चारों ओर एकत्र हो जाते!

सब मिलकर आग की परिक्रमा करते ,
ढोल की थाप के साथ गिद्दा और भांगड़ा नृत्य विशेष आकर्षण का केंद्र होते,
पंजाब की शान में चार चांद लगाने वाला यह पर्व,
उत्तर भारत में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है यह उत्सव!

सभी मिलकर आग में गुड़, तिल, रेवड़ी, गजक डालते,
आग के इर्द-गिर्द नाचते-गाते और खुशियां मनाते,
पॉपकॉर्न और तिल के लड्डू भी एक दूसरे को बांटते,
आग के पास घेरा बनाकर दुल्ला भट्टी की कहानी सुनाते!

लोकगीत गाकर लकड़ी और उपले करते हैं इकट्ठे,
हर्षोल्लास के साथ, सभी एक दूसरे से गले मिलते,
इस त्यौहार का उद्देश्य है, आपसी एकता बढ़ाना,
इस त्यौहार में, बनता है, मक्का की रोटी, सरसों का साग और बहुत सारा स्वादिष्ट खाना!

चलो हम सब भी मिलकर बनाएं लोहड़ी,
आग में डालें मूंगफली, खील, मक्की के दाने और रेवड़ी,
ले हम भी, इस उत्सव में भाग,
खाए सब मिलकर गज्जक, मूंगफली,मक्का की रोटी और सरसों का साग !!

डॉ. माध्वी बोरसे!
(स्वरचित व मौलिक रचना)
राजस्थान (रावतभाटा)


Related Posts

musibat jab bhi aati hai by gaytri shukla

July 18, 2021

मुसीबत जब भी आती है मुसीबत जब भी आती हैबहुत कुछ कह के जाती है । रात कितनी अंधेरी होसमय

kavya Purvagrah by sudhir Srivastava

July 18, 2021

 पूर्वाग्रह हमने समझा जिसे साधू वो तो शैतान निकला, दुत्कारा था जिसे उस दिन बहुत इंसानरुपी वो तो भगवान निकला।

kavita balatkar written by rajesh

July 18, 2021

बलात्कार ज्येठ महीने की थी बात , भीषण गर्मी की थी रात।स्कूल हमारे बंद हुए थे,थक के हम भी चूर

swapn kavita by Arun kumar shukla

July 18, 2021

शीर्षक-स्वप्न लोग कहते जिंदगी का है सफर छोटा,जानकर के भी मगर मैं भूल जाता हूं।जिस समय मैं सोचता बेचैन रहता

Rishta apna by Dr hare Krishna Mishra

July 18, 2021

 रिश्ता अपना अर्धांगिनी उत्तराधिकारिनी , मेरे जीवन की कामिनी , बहती आई अंतस्थल में , पावन निर्मल गंगा जैसी  ।।

gazal by rinki singh sahiba

July 18, 2021

ग़ज़ल  सौ बार उससे लड़ के भी हर बार हारना, बाज़ी हो इश्क़ की तो मेरे यार हारना। उससे शिकस्त

Leave a Comment