Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Mamta_kushwaha, poem

मुस्कुराना सीख रही

मुस्कुराना सीख रही मुस्कुराना सीख रही हूँ तुम्हारे बिना जीना सीख रही हूँहाँ आज फिर से मुस्कुराना सीख रही हूँजो …


मुस्कुराना सीख रही

मुस्कुराना सीख रही

मुस्कुराना सीख रही हूँ

तुम्हारे बिना जीना सीख रही हूँ
हाँ आज फिर से मुस्कुराना सीख रही हूँ
जो तुम्हारे जाने के साथ-साथ
चेहरे से चली गई थी ,
मानो तुम्हारे बिना
जिन्दगी की हर साज रूठ गयी
हाल ऐ मेरा क्या बताऊँ अब
बिना जल मछली जैसी तड़प मेरी
जो देखे मोहे देते सांत्वना मुझे ,

तुम्हारा ही नाम लेकर कहते
अगले जन्म तुम दोनों का साथ
होगा लम्बी आयु का, ना रहो मायूस
प्रियतम तेरा वापस आयेगा
खुशियों का रंग बिखेर देगा ,

लो देखो ना आज फिर से
मुस्कुराना सीख रही हूँ
कुछ इस तरह उदासी छिपा रही
और तुमसे किये वादें निभा रही
जो तुमने लिया था हमसे
हमेशा मुस्कुराते रहने का ,

गम हो या खुशियों का शाम
ना रखना उदासी चेहरे पर
तो कैसे भूल जाए ये वादें तुम्हारे
लो आज फिर से मुस्कुराना सीख रही
जिंदगी की हर साज अपना रही ।

About author   

Mamta Kushwaha
ममता कुशवाहा

स्वरचित रचना
मुजफ्फरपुर, बिहार


Related Posts

गजल

June 24, 2022

 गजल मईनुदीन कोहरी”नाचीज बीकानेरी” म्हारे वतन मे अमन-चैन बण्यो रैवै । आ प्रार्थना जणो-जणो करतो रैवै ।। घर – घर

बन्दा नवाज

June 24, 2022

 बन्दा नवाज        मईनुदीन कोहरी”नाचीज बीकानेरी” हर जर्रा – जर्रा उसका ही मोहताज है । हर जर्रे –

बलात्कार

June 24, 2022

 बलात्कार डॉ. इन्दु कुमारी  दरिंदगी की पहचान है  समाज का अभिशाप है  गंदगी की अंबार है  संकुचित विचारों का  गंदी

पृथ्वी दिवस

June 24, 2022

 पृथ्वी दिवस डॉ. इन्दु कुमारी  वसुंधरा को आइए  पेड़ों से सजाइए  वन बागों से इस धरा पर  जीवन की फसलें

प्रकृति के आंचल

June 24, 2022

 प्रकृति के आंचल डॉ. इन्दु कुमारी  प्रकृति हमारी हम प्रकृति के  सजाएंगे हम तो पाएंगे हम  लगाएंगे हम खाएंगे हम 

बुढ़ापे की मुंडेर

June 24, 2022

 बुढ़ापे की मुंडेर डॉ. इन्दु कुमारी  जन्म लिए बचपन बीते  खुशियों के होंठ खिले  बचपन के छोटे पौधे  फूल रूप

PreviousNext

Leave a Comment