Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Anita_sharma, poem

पहले जैसा नहीं रहा- अनिता शर्मा झाँसी

पहले जैसा नहीं रहा क्यों हर रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा ?हाँ सोचती हूँ मैं अक्सर ही कि-क्यों हर रिश्ता …


पहले जैसा नहीं रहा

पहले जैसा नहीं रहा- अनिता शर्मा झाँसी

क्यों हर रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा ?
हाँ सोचती हूँ मैं अक्सर ही कि-
क्यों हर रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा।
कितने सिमटकर रह गये हैं रिश्ते कि
अब!पहले वाली बात रही नहीं उनमें।
सोचती हूँ मैं अक्सर ही कि पहले जैसा
कुछ बचा नहीं इस दौर में ।
कितने उलझ कर रह गये हम सभी
कि पहले वाली बात अब बची नहीं।
वो खुशियों का दौर वो मनमौजी फितरत
अब रिश्तों में बची ही नहीं।
वो अपेक्षाओ की बलि वेदी में दफन हो गया
कि हाँ हर रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा।
संकोच और संतुष्टि के भाव न जाने कहाँ आलोप हो गये
कि रिश्ते अब औपचारिकता की भेंट चढ़ गए।
वो मेल मिलाप भी न जाने कहाँ अंतर्धान हो गया
कि हर रिश्ता अब पहले जैसा नहीं रहा।
वो डांट वो डपट और अपनापन भी अब
झंझटों के डर का शिकार हो गया।
आज सोचती हूँ मैं अक्सर ही कि हर रिश्ता
पहले जैसा नहीं रहा।
आधुनिकता की आहुति में स्वाहा हो गया
कि हर रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा।
एक दूसरे की भावनाओं को समझते थे
कि आज अपनी भावनाओं के लिए वक्त नहीं रहा।
हाँ आज हर रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा
जो बात पहले थी कभी वो बदल गयी।
कि अब हर रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा
आज हर रिश्तों में परतें चढ़ गयी।
न जाने वो रौनक वो ठहाके भी गुम हो गये
कि आज अक्सर देखती हूँ बनावट हावी हो गयी।
कि आज हर रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा है।
वो अदब वो शिष्टाचार बेलगाम हो गया
कि आज आचरण भी बेनकाब हो गया है।
कितने विविधतापूर्ण जीवन जी रहे हैं
कि आज धैर्य और संयम ही साथ छोड़ रहा है।
हर रिश्ता आज खोखलेपन का शिकार हो रहा है
कि आज हर रिश्ता अधूरा ,असहाय हो गया है।
सोचती हूँ मैं अक्सर ही कि पहले जैसा
अब कुछ भी नहीं रहा है।
रिश्तों के अपनेपन ने अब दिखावा ओढ़ लिया है।
अब रिश्तों में पहले वाली बात बची नहीं है
हाँ आज हर रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा है।।

अनिता शर्मा झाँसी


Related Posts

kavita sawan ki bund by kamal sewani

June 23, 2021

सावन की बूँद सावन की रिमझिम बूँदें जब ,   झरतीं नील गगन से ।  शस्य रूप अवलोकित होता ,   वसुधा

kavita-wo jamana by sudhir srivastav

June 23, 2021

वो जमाना आज जब अपनेपिताजी की उस जमाने कीबातें याद आती हैं,तो सिर शर्म से झुक जाता है।माँ बाप और

kavita-haiwaniyat by antima singh

June 23, 2021

 कविता-हैवानियत कमजोर जानकर किसी को क्युं सताते हैं लोग, मासूम दिलों पे पत्थरों की बौछार क्युं चलाते हैं लोग, कभी

kavita kal ki mahabharat aur aaj ki mahabharat by saurabh

June 23, 2021

“कल की महाभारत और आज की महाभारत” महाभारत के सभी पात्र, अब तो घर ही में है,घृतराष्ट्र, दुर्योधन, शकुनि, सब

kavita- aaj phir giraft me aaya darpan by anita sharma

June 22, 2021

आज फिर गिरफ्त में आया दर्पण, आज फिर गिरफ्त में आया दर्पण, आज फिर चेहरे का नकाब डहा। दिल में

kavya – gaon ki galiyan by sudhir shrivastav

June 22, 2021

गाँव की गलियां समयचक्र औरआधुनिकता की भेंटचढ़ गईं हमारे गाँव की गलियां,लगता ऐसे जैसे कुछ खो सा गया है,अपनापन गलियों

Leave a Comment