Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem, Siddharth_Gorakhpuri

गुमशुदा जरा लिख तहरीर मेरी

गुमशुदा जरा लिख तहरीर मेरी ऐ थाना – ए – गुमशुदा जरा लिख तहरीर मेरीखो गया हैं सुकून और अच्छी …


गुमशुदा जरा लिख तहरीर मेरी

ऐ थाना – ए – गुमशुदा जरा लिख तहरीर मेरी
खो गया हैं सुकून और अच्छी वाली तक़दीर मेरी

स्याह रातों में मैं होता हूं खुद के हवाले
बेजान से शबिस्तान में हर चाह टाले
ख्वाब बिखरे हैं रातों में क़त्ल होकर
अरे यही तो थे बस जागीर मेरी
ऐ थाना – ए – गुमशुदा जरा लिख तहरीर मेरी

गम -ए -जिंदगी आहिस्ते से रुला जाती है
घूँट – घूँट कुछ अश्कों के पिला जाती है
क्या था…. क्या हूँ….. क्या हूँगा मैं
बदल गयी हैं अब तो तासीर मेरी
ऐ थाना – ए – गुमशुदा जरा लिख तहरीर मेरी

स्वप्न उलझे हैं ख्यालों के कई फंदे में
उतरे हैं मुक़म्मलफरामोशी के धंधे में
सुनकर यकीन न कर पाया कोई
ऐसी फरामोश निकली ताबीर मेरी
ऐ थाना – ए – गुमशुदा जरा लिख तहरीर मेरी

About author

-सिद्धार्थ गोरखपुरी

-सिद्धार्थ गोरखपुरी


Related Posts

कविता – छाँव सा है पिता

June 23, 2022

 कविता – छाँव सा है पिता सिद्धार्थ गोरखपुरी गलतफहमी है के अलाव सा है पिता घना वृक्ष है पीपल की

कविता -आँखें भी बोलती हैं

June 23, 2022

 कविता -आँखें भी बोलती हैं सिद्धार्थ गोरखपुरी न जीभ है न कंठ है कहने का न कोई अंत है दिखने

कविता -गँवईयत अच्छी लगी

June 23, 2022

 कविता -गँवईयत अच्छी लगी सिद्धार्थ गोरखपुरी माँ को न शहर अच्छा लगा न न शहर की शहरियत अच्छी लगी वो

ग़ज़ल – हार जाता है

June 23, 2022

 ग़ज़ल – हार जाता है सिद्धार्थ गोरखपुरी गुरुर बड़ा होने का है मगर ये जान लो यारों प्यास की बात

कविता – बचपन पुराना रे

June 23, 2022

 कविता – बचपन पुराना रे सिद्धार्थ गोरखपुरी ढूंढ़ के ला दो कोई बचपन पुराना रे पुराना जमाना हाँ पुराना जमाना

ये ख्वाब न होते तो क्या होता?

June 23, 2022

 कविता – ये ख्वाब न होते तो क्या होता? सिद्धार्थ गोरखपुरी झोपड़ी में रहने वाले लोग जब थोड़े व्यथित हो जाते

PreviousNext

Leave a Comment