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Bhaskar datta, poem

कविता – रातों का सांवलापन

रातों का सांवलापन आकाश रात में धरती को जबरन घूरता हैक्योंकि धरती आसमान के नीचे हैऔर मेरा मनऊपर खिले उस …


रातों का सांवलापन

कविता – रातों का सांवलापन

आकाश रात में धरती को
जबरन घूरता है
क्योंकि धरती आसमान के नीचे है
और मेरा मन
ऊपर खिले उस छोटे से फूल को
जो सबको बराबर दिखता है
दिन में नहीं,
केवल रातों को दिखाई देता है
मगर सांवली रात हो तो….
आंखें चांद को एकटक घूरती हैं
ठीक उसी तरह जैसे
आसमान नीचे घूरता है
दोनों में अंतर है तो बस इतना
कि पहला दिन में भी ताकता है
लेकिन नशीली आँखें
रात का इंतज़ार करती हैं
ताकि वे देख सकें
अपनी काली आंखों से
अपने ही समान
स्वच्छ, सफेद , निर्मल ‘चंद्रमा’ को
जो सफेद होकर भी बेदाग़ नहीं है
बावजूद इसके
काली आँखों पर
चाहे कितनी ही सफेद पट्टियाँ
मज़बूती से कस दो
पर वे सुबूत मांगती हैं…..!
आखिर कब तक
ऐसे खिलंदड़
भागते फिरेंगें
कभी तो न्याय मिलेगा?
चापलूस वकीली पेशकारों
और न्यायिक ढोंग पंथी जजों से
तभी धरती की शीतलता
आसमानी नजारों से दूर होगी…
चांद सांवली रात को गले लगाकर
दूर से मुस्कुरायेगा कि
अचानक पता चलेगा
दिवस का सूर्य-‘भास्कर’
अपनी मंद-मंद मुस्कान
धरती के प्रत्येक अंश में
प्रवाहित करते हुए गतिमान हुआ
कि रातों का सांवलापन छंट गया….

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भास्कर दत्त शुक्ल  बीएचयू, वाराणसी
भास्कर दत्त शुक्ल
 बीएचयू, वाराणसी


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