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आओ घरों को टूटने से बचाएं

आओ घरों को टूटने से बचाएं घर तब तक नहीं टूटता, जब तक फैसला बड़ों के हाथ में होता है …


आओ घरों को टूटने से बचाएं

आओ घरों को टूटने से बचाएं

घर तब तक नहीं टूटता, जब तक फैसला बड़ों के हाथ में होता है – हर कोई बड़ा बनने लगे तो घर टूटने में देर नहीं लगती

आधुनिक युग कोई परिवार में बड़ों के लिए तरसे – कोई बड़ों पर गुस्से से बरसे की ओर चल पड़ा है – एडवोकेट किशन भावनानी

गोंदिया – कुदरत द्वारा रचित अनमोल खूबसूरत सृष्टि में भारत आदि अनादि काल से संस्कृति सभ्यता बड़े बुजुर्गों को मान सम्मान संयुक्त परिवार प्रथा सहित सभी गुणों में विशाल वटवृक्ष की भांति फलता फूलता रहा है हमारे बड़े बुजुर्गों ने स्वर्णलोक, स्वर्ग अनुभूति इस सृष्टि में धरती पर अपनों के बीच किया देखा और सुख भोगा है। उन अपार सुख के फूलों में से एक फूल है घर, परिवार,संयुक्तपरिवार एक मजबूत सुख की छावं देने वाला, छत्रछाया देने वाला संयुक्त परिवार घर परिवार जहां बड़े बुजुर्गों के छत्रछाया में जीवनजीने उनके फैसलों पर अमल करनें, आगे बढ़ाने और समर्पित भाव से जीवन जीने का सुख, अनमोल क्षण के साए में जीवन जीने का आनंद ही कुछ और है। परंतु वर्तमान परिपेक्ष में धीरे-धीरे हमारे युवादेश के अधिकांश युवा पाश्चात्य संस्कृति के साए में बड़े बुजुर्गोंको नजरअंदाज कर, एकला चलो रे!! वाली नीति पर चलने की राह पर हैं किसी का लिखा एक खूबसूरत वाक्यांश बता दें, घर तब तक नहीं टूटता तब तक फैसला बड़ों के हाथ में होता है, अगर घर का हर सदस्य बड़ा बनने लगे तो घर टूटने में देरी नहीं लगती इसलिए अब समय आ गया है कि हमें बड़े बुजुर्गों की आज्ञा, उनकी छत्रछाया में जीने का अंदाज सीखने कीतात्कालिक आवश्यकता है इसलिए हम इस आर्टिकल के माध्यम से आओ घरों को टूटने से बचाएं पर चर्चा करेंगे।
साथियों बात अगर हम महत्वपूर्ण फैसलों के बड़ों के हाथों से छुटने की करें तो, उम्र के फ़र्क़ के साथ साथ बड़े बुजुर्गों और बच्चों के मूल्यों में अंतर आ जाता है। मिसाल के लिए अगर बड़े बुजुर्ग बहुत धार्मिक हैं और उन्होंने बच्चों को भी वहीं संस्कार दिए तो भी ज़रूरी नहीं कि बच्चे उन्हीं संस्कारों को मानें, बस!!यहीं से टकराव की शुरूआत होती है। अलगाव की स्थिति पैदा हो जाती है, ये भी देखा गया है किआमतौर से अलग होने वाले माता-पिता और बच्चों के बीच अलग होने की वजह को लेकर कोई संवाद नहीं होता, इसलिए पताही नहीं चलता कि आख़िर वजह क्या है।इसके अलावा भाई-बहनों के अलग मिज़ाज और माता-पिता का किसी एक बच्चे के प्रति गहरा लगाव भी अलगाव की वजह बन जाते हैं, ऐसा नहीं है कि परिवार में अलगाव तेज़ी से और रातों रात हो रहा है. बल्कि ये बहुत धीरे धीरे हो रहा है। कई बार छोटी सी घटना भी परिवार को तोड़ देती है। कहने को तो वो एक घटना होती है लेकिन उसके नतीजे दूरगामी होते हैं।
साथियों बात अगर हम घर में हर कोई बड़ा बनने के दो मुख्य कारणों की करें तो, पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि भूमंडलीकरण की वजह से उन देशों में भी परिवार टूट रहे हैं, जहां अकेले रहने की रिवायत नहीं है, भारत की ही बात करें तो बड़ी संख्या में लोग रोज़गार की तलाश में गांवों से शहरों में या विदेशों में पलायन कर रहे हैं। वहीं जिन देशों में सरकार की ओर से बेहतर सुविधाएं नहीं मिलतीं वहां बुज़ुर्ग, नौजवान और बच्चों के बीच मज़बूत रिश्ता और एक दूसरे से लगाव देखने को मिलता है, इसकी मिसाल हमें यूरोप के कुछ देशों में देखने को मिलती है। बाहर बड़े शहरों या विदेश में रोजगार में जाने की वजह से माता-पिता से दूरी बन जाती है, साथ ही ऐसे परिवारों में आर्थिक रूप से लोग एक दूसरे पर निर्भर नहीं करते,स्वाभाविक रूप से वे अपने फैसले खुद लेने लगते हैं, लिहाज़ा उन्हें अलग होने में कोई हिचक भी महसूस नहीं होती। ये भी देखा गया है कि जो किसी समुदाय के लोग एक दूसरे से ज़्यादा क़रीब रहते हैं, उनके यहां बड़े परिवार भी एक छत के नीचे रहना पसंद करते हैं, ये भी हो सकता है कि असुरक्षा का भाव उन्हें ऐसा करने को कहता हो। शहरों में बड़े परिवार को साथ रखना आसान नहीं है,हर कोई बड़ा बनने एवं फैसला लेने की चाह रखता है इसलिए भी बुज़ुर्गों के साथ अलगाव की स्थिति पैदा हो रही है और गुज़रते दौर के साथ ये स्थिति और मज़बूत होगी। लेकिन किसी भी समाज में जो सांस्कृतिक मूल्य बहुत मज़बूत होते हैं, वो आसानी से ख़त्म नहीं होते. लिहाज़ा जिन समाज में परिवार के साथ रहने का चलन है वो आगे भी रहेगा, परंतु मुमकिन है कि आने वाले 20 साल में स्थिति पूरी तरह बदल जाएगी।
साथियों बात अगर हम उस एक पुराने जमाने की करें जहां संयम, बड़ों की कद्र और संयुक्त परिवार से संयुक्त समाज का निर्माण हुआ था और फैसला लेना बड़ों के हाथ में रहता था तो, उस दौर में संयम, बड़ों की कद्र, छोटे बड़े का कायदा, नियंत्रण इन सब बातों का प्रभाव था। ऐसे ही संयुक्त परिवारों से संयुक्त समाज का निर्माण हुआ था और पूरा मोहल्ला और गांव एक परिवार की ही तरह रहते थे।परिवार का नहीं, मोहल्ले का बुजुर्ग सबका बुजुर्ग माना जाता था और ऐसे बुजुर्गों के सामने जुबान चलानें या किसी अप्रिय कृत्य करने का साहस किसी का नहीं होता था। उस दौर में मोहल्लों में ऐसा माहौल और अपनापन होता था कि ‘गांव का दामाद’ या ‘मोहल्ले का दामाद’ कहकर लोग अपने क्षेत्र के दामाद को पुकारते थे और अगर कोई भानजा है तो किसी परिवार का नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले और गांव का भानजा माना जाता था और यही कारण था कि लोग ‘गांव की बेटी’ या ‘गांव की बहू’ कहकर ही किसी औरत को संबोधित करते थे।
साथियों बात अगर हम आओ घर को टूटने से बचाने के आसान उपायों की करें तो, एक संयुक्त परिवार और बड़े बुजुर्गों के निर्देशन में जीने का सही तरीका है? स्वार्थ भावना से दूर रहकर, खुद से पहले दूसरोंं की खुशी का ध्यान रखना होगा और हमारा परिवार हमारी खुशी का ध्यान रखेगा।अपने कर्तव्यों को पूरा करने की कोशिश हमेशा होनी चाहिए। बड़ो के प्रति आदर भाव और छोटोंं के प्रति प्रेम होना चाहिए। घर छोटा हो या बड़ा लेकिन दिल हमेशा बड़ा होना चाहिए। अपनी इच्छाओं से पहले परिवार की जरूरतों को ध्यान में रखना चाहिए। संयुक्त परिवार में मेरा कुछ नहींं होता जो भी होता है वो सबका होता है। कुछ बातों को नजरअंदाज करने की कला तो कुछ बातों पर ध्यान देने की कला आनी चाहिए। हर खुशी बड़ी हो जाती है और हर दुख छोटा सयुक्त परिवार में। साथ बैठने का और साथ खाने का महत्व समझना चाहिए।शेयर करना स्वभाव होना चाहिए क्योंकि, बस एक दूसरे का हाथ पकड़कर चलना सीख लो।सहनशीलता अच्छी होनी चाहिए।सामंजस्य बैठाना भी आता हो।
साथियों मेरा यह निजी अनुभव है कि, मेरा परिवार सयुंक्त परिवार और इसीलिए मैने इस प्रश्न का उत्तर देना चाहा। सभी का उचित सम्मान होना चाहिए, विशेष रूप से छोटे बड़ों का हमेशा सम्मान करें। कार्यों का उचित विभाजन हो, जिससे टकराव ना हो। पुरानी कहावत है कि- जहाँ चार बर्तन होते है, वहां टकराव होता है, ये खटपट भी मधुर होनी चाहिए। बाहर की चुगलखोरी एवं चापलूसी को बिल्कुल ध्यान न दे, क्योंकि यह हमारे भारतवासियों का जन्मसिद्ध अधिकार है वो तो करेंगे ही।अंत में सबसे जरूरी-आपस में प्यार, नहीं तो उपर लिखी सारी बातें बेकार।

करो दिल से सजदा तो इबादत बनेगी।
बड़े बुजुर्गों की सेवा अमानत बनेगी।।
खुलेगा जब तुम्हारे गुनाहों का खाता।
तो बड़े बुजुर्गों की सेवा जमानत बनेगी।।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि आओ घरों को टूटने से बचाएं। घर तब तक नहीं टूटता जब फैसला बड़ों के हाथ में होता है, हर कोई बड़ा बनने लगे तो घर टूटने में देर नहीं लगती। आधुनिक युग कोई परिवार में बड़ों के लिए तरसे, कोई बड़ों पर गुस्से से बरसे की ओर चल पड़ा है।

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Kishan sanmukh

-संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र


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