Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Bhawna_thaker, lekh

अपनी स्त्री की ‘ना’ को समझने की समझ कितने मर्दों में होती है?

 अपनी स्त्री की ‘ना’ को समझने की समझ कितने मर्दों में होती है? क्यूँ दब जाती है नारी की ‘ना’ …


 अपनी स्त्री की ‘ना’ को समझने की समझ कितने मर्दों में होती है?

क्यूँ दब जाती है नारी की ‘ना’ मर्दाना अहं के ढ़ेर के नीचे दब कर। बेशक एक एहसास को फलीभूत किया जा सकता है, ये हुनर क्यूँ नहीं होता हर मर्द में। एक नाजुक हथेली को मजबूत हथेलियों में थामकर जैसी तेरी मर्ज़ी, खुश? इतना कहने के लिए कहाँ कोई ट्यूशन की जरूरत होती है। 

क्यूँ मर्दों को अपने साथ जुड़ी अपने दिल के बेहर करीब होती स्त्री की संवेदना स्पर्शती नहीं? स्त्री भी इंसान है उसकी भी पसंद-नापसंद, मर्ज़ी-नामर्ज़ी होती है। खासकर सेक्स के मामले में कुछ मर्दों को चुटकी सिंदूर लाइसेंस के बराबर लगता है। मैं तेरा पति हूँ, मेरा पूरा अधिकार है, मैं जब चाहूँ मनमानी कर सकता हूँ। जैसे पत्नी इंसान नहीं भेड़ बकरी हो। औरतों को माहवारी के दिनों में भी नहीं बख़्शते। जिन दिनों औरतों को मानसिक और शारीरिक आराम की जरूरत होती है, उन दिनों मर्द सिर्फ़ लाश को गले लगाते अपनी हवस पूरी कर रहा होता है। स्त्री के एहसासों पर उदासी की परत मली होती है। मर्द खंगाल रहा होता है अपनी वासना मुखर करते उन्माद हीन काया से हर पहरन का वसन चिरते सिर्फ़ ठंड़े गोश्त का लुत्फ़ उठा रहा होता है। संदली गेसूओं में जंगलियत भरते खाल खिंच रहा होता है एक-एक बाल की, और स्त्री आँखें मूँदे घुटन का कटोरा बूँद-बूँद पी रही होती है।

चाह कर भी ब्याहता प्रतिसाद में एक भी चुंबन दे नहीं पाती, पेढू में उठ रही पीड़ ने प्रणय की पराकाष्ठा पर नफ़रत का ज़हर घोल दिया होता है। काश पत्नी की ना को समझते माहवारी का चार दिन का अनमना मौसम काट लेते, उम्र के सारे मौसम उसके नाम ही तो किए होते है। मर्द हक का मारा होता है, और अबला के अहसास पर चुटकी सिंदूर भारी होता है। ना कहने की भी हकदार नहीं होती।

क्यूँ कुछ स्त्रियों को किसी फैसले का अधिकार नहीं होता? मर्द के बनाए बंदीशों के दायरे से सिमटकर रहना पड़ता है।  

बात सिर्फ़ अंतर्मन से उठती भावनाओं की होती है। मर्द के दिल से उठता ये भाव औरत के होठों की हंसी और ज़िंदगी जीने की वजह बन सकता है। पर काटों को फूल की खुशबू से कहाँ मतलब चुभने की फ़ितरत जो ठहरी। कभी स्त्री के फैसले का स्वीकार करके भी देखिए, थोड़ा हक देकर देखिए, थोड़ी आज़ादी देकर देखिए जीवन में खुशियों के फूल खिल उठेंगे। 

सिर्फ़ स्त्री की ‘ना’ को अपनाने वाला महज़ एक वाक्य “ठीक है जैसी तुम्हारी मर्ज़ी” सारे ताले खोल देगा। पंखुडी की तरह स्त्री की ना को मसल देना स्त्री के आत्मा की मौत है। स्त्री की नामर्ज़ी को चाहकर तो देखो, आपकी परवाह के बदले लूटा देगी अपनी चाहत के सारे ज़ेवर। 

पर ना कुछ मर्द संवेदना हीन होते है। सदियों से कुछ नदियाँ भटकती है अपनी पसंद के समुन्दर की तलाश में न उनको किनारा मिलता है, न अपनी पसंद का समुन्दर, आख़िरकार किसी मोड़ पर आकर सूख जाती है।

About author

bhawna thaker

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु

Related Posts

कहानी -वारसदार की महिमा

April 25, 2022

 “वारसदार की महिमा” आज ‘सनशाइन विला’ को स्वर्ग सा सजाया गया है, मेहमानों को दावत दी गई है, सबकुछ होते

Just say it’s ok

April 25, 2022

 “Just say it’s ok” आजकल ऑनलाइन शोपिंग और बाहर का खाना खाने का शौक़ हम लोगों पर कुछ ज़्यादा ही

धर्मांधता का अजगर देश को निगल रहा है

April 25, 2022

“धर्मांधता का अजगर देश को निगल रहा है” सबको धर्म के प्रति खुद के विचार श्रेष्ठ लगते है। चाहे हिन्दु

कहानी – गुरु दक्षिणा

April 25, 2022

कहानी- “गुरु दक्षिणा” वृंदा ने अपने पति संजय से कहा सुनिए दिवाली आ रही है, अडोस-पड़ोस के सारे बच्चें नये

मेहनत की मिसाल अख्तर आमिर

April 25, 2022

“मेहनत की मिसाल अख्तर आमिर” मेहनत की मिसाल IAS अधिकारी अख्तर आमिर खान वर्तमान समय में श्रीनगर में पोस्टेड हैं।

लहरों पे लहर

April 25, 2022

 लहरों पे लहर आज कल समाचारों में फिर से करोना का संकट गहरा रहा हैं।चीन के साथ साथ हांगकांग और

Leave a Comment