Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

vyakul dhara by Dr. Hare krishna Mishra

 व्याकुल धरा आज व्याकुल क्यों धरा आकाश भी बेचैन है, जलमग्न होती जा रही कैसी विवशता है धरा  ? हम …


 व्याकुल धरा

vyakul dhara by Dr. Hare krishna Mishra

आज व्याकुल क्यों धरा आकाश भी बेचैन है,

जलमग्न होती जा रही कैसी विवशता है धरा  ?

हम अधूरे ज्ञान से सोच मेरी है कहां जरा बता ,

निज कर्म को और धर्म को छोड़ हम जा रहे कहां ?

संकल्प हमारा है अधूरा छोड़ पथ से भटक गये ,

विनाश  मेरा दिख रहा , बेचैन  केवल  है धरा ,

चेतना क्यों  शून्य होती  जा रही है आज मेरी ,

संवेदना से दूर होकर कैसी हमारी जिंदगी है। ?

सोच चिंता में पड़ा हूं आज विवस मानव कहां ,

संवेदना सारी धरा की सोच मेरी खो गई क्यों ?

विवशता तो कह रही है डूब जा मझधार में तू ,

चेतना विहीन मानव शून्य  होता  जा रहा है  ।।

विश्व का जो दृश्य आज दिखता जा रहा है ,

क्या धरा जलमग्न होगी यही समस्या है मेरी,

स्वार्थ में संसार घिरता जा रहा है देख आज ,

हम कहां हैं ज्ञात मुझको है नहीं लाचार हूं। ।।

यथार्थ पट को देखकर विचित्रता भी नग्न है,

नग्न  है विवेक मेरा क्यों धरा से दूर हम ?

खो गया चरित्र  मेरा  कर्म से हम दूर  हैं ,

हम प्रकृति की गोद में हो गए हैं मौन क्यों ?

अस्तित्व मेरा आज संकट में पड़ा है ,

स्वार्थ में दिखता नहीं कोई भी अपना ,

स्वप्न वत संसार  में जीना भी क्या है ?

आज पराजित कर्म क्यों तेरा दिखा है ।।?

भूल मत  पूर्वजों को दृढ़ कर संकल्प को,

इंतजार में आज भी तेरी धरा देख मौन है,

समय सदा संकेत देता रह गया है पास तेरे,

मौन को तू त्याग कर खोल अपने हाथ को  ।।

मौलिक रचना

                    डॉ हरे कृष्ण मिश्र
                    बोकारो स्टील सिटी
                    झारखंड ।


Related Posts

यादों का सिलसिला- डॉ इंदु कुमारी

February 3, 2022

यादों का सिलसिला तेरी हसीन यादों का सिलसिला अमिट है धूमिल नहीं होने वाली प्रेम पौधे उगाने वालीदमकती चेहरे की

नी बखत री बात-मईनुदीन कोहरी”नाचीज़ “

February 3, 2022

नी बखत री बात धोरां री आ ” धरती , धीरज री धरा सांतरी । सोनै सी गोरी बाळू रेत

तू ही तू है- नाचीज़ बीकानेरी “

February 3, 2022

तू ही -तू है जमीं से फलक तक तू ही -तू है । दिल की धड़कनों में तू ही –

सूरज दादा- विजय लक्ष्मी पाण्डेय

February 3, 2022

सूरज दादा सूरज दादा उठा के गठरी, चले कुम्भ के मेला में।बसन्त पंचमी नहा केआउँ,दिन बीता बहुत झमेला में।।लुका छिपी

ऊँचा हो गया कद लोगों का जमींन से-विजय लक्ष्मी पाण्डेय

February 3, 2022

ऊँचा हो गया कद लोगों का जमींन से ऊँचा हो गया कद लोगों का जमीन सेसुना है जमीनें बंजर पड़ी

मेरे यार फेसबुकिए-सिद्धार्थ गोरखपुरी

February 3, 2022

मेरे यार फेसबुकिए मेरे यार फेसबुकिए बता दो इस समय तुम हो कहाँमैंने तुम्हें ढूंढ रहा हूँयहाँ -वहाँ न जाने

Leave a Comment