Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

Toote riste by Dr. Hare krishna Mishra

 टूटे रिश्ते  चलो एक बार मिलते हैं हम दोनों , पूर्व वत अपने गंतव्य पर  चलकर , मिलनेऔर आने का …


 टूटे रिश्ते 

Toote riste by Dr. Hare krishna Mishra

चलो एक बार मिलते हैं हम दोनों ,

पूर्व वत अपने गंतव्य पर  चलकर ,

मिलनेऔर आने का यही संदेश तेरा,

अपना भी इरादा तो ऐसा ही बनता है।   ।।

कहती हो सदा अपनी मेरा मन नहीं लगता,

चलना है तेरे संग संग घर अपना वही तो है,

बिताएंगे समय अपना थोड़ा मन बहल जाए,

मिलनेऔर बिछड़ने का भी अभ्यास बन जाए  ।।

मिले थे हम अभी दोनों सपनों को सजोने में ,

जुदाई भी लिखा था जो नियति के बाहों में ,

चलो इतना अच्छा है दिया संयोग जो उसने,

कभी गम तो खुशियां भी इच्छा तो उसी की है ।।

मर्यादा भी अपनी है बंधन भी तुम्हारा है,

आजीवन बंधें तेरे प्रणय की ही डोरी में ,

धड़कन भी बताती है गति तेरी मेरी अपनी,,  

तेरे सांसों की डोरी से हीं है जिंदगी अपनी  ।।

दुनिया तो नहीं छोटी सीमा इसकी अपनी है,

भटकना और भूलना क्या धरती तो हमारी है,

इसी मिट्टी में आए हैं इसी में तो जाना है ,

दिखावा जिंदगी का झूठा एक बहाना है  ।।

सांसो से सांसों की मिलन यहीं तो टूटी है,

विधाता ने खींची है हमारी सांस की डोरी ,

किया होगा जो निर्णय सोचा तो वही होगा ,

संतुष्टि तो अपनी है यही गीता का दर्शन है  ।।

चल धरा को छोड़कर पर लोक की यात्रा करें,

अब हमारा है यहां क्या साथ हम भी बढ़ चलें,

धरा धाम की यात्रा हमारी हो गई है आज पुरी,

बुला रहा है आत्मा को परमात्मा संकेत देकर  ।।

चल यहां से गंतव्य अपना पर धरा पर दूर  जाना,

आश में  बैठी हुई  जो हर पल  प्रतीक्षा कर रही ,

रुक गया था मैं यहां पर दौड़ संग संग चल न पाया,

क्या कहूं अफसोस इसका दूर तुम से  रह गया हूं। ।।ं

हाय रे नैराश्य जीवन न पा सका गंतव्य अब तक ,

चल करूं आराधना मैं ब्रह्मलीन अब तो हो गई है,

पुण्य पथ पर बढ़ गई तुम मैं यहां  रह गया अकेला ,

अंधकारमय जीवन यहां  है प्रकाश  हमसे दूर है  ।।

लिखे हैं गीत जो मैंने  व्यथा तुझसे छुपाना क्या,

यही है जिंदगी मेरी दर्द-ए-दिल कहानी की ,

गई है छोड़ जब से तुम जमाने से जुदा मैं हूं,

गीतों और गजलों में जुड़ी  है जिंदगी  मेंरी  ।।

सदा होती तेरी चर्चा निरुत्तर मैं सदा होता,

कहूंगा क्या मैं जमाने से मजबूरी यही मेरी  ,

कितना दूर अपनों से, गम से बन गया नाता ,

रिश्ते को निभाना क्या रिश्ता टूट गया मेरा  ।।

मौलिक रचना

                     डॉ हरे कृष्ण मिश्र
                     बोकारो स्टील सिटी
                     झारखंड।


Related Posts

भारत को सोने की चिड़िया बनानां हैं

October 16, 2022

कविता–भारत को सोने की चिड़िया बनानां हैं भारत को सोने की चिड़िया बनानां हैंभ्रष्टाचार को रोककर सुशासन को आखरी छोर

चांद की व्यथा

October 16, 2022

चांद की व्यथा गातें थे बहुत फसाने मेरी चांदनी केपटाने अपने हुस्न की मल्लिका कोरात रात जग कर देख मुझे

शहरों की शान

October 16, 2022

शहरों की शान आज गुजर रहा था सड़क परएक वृद्ध को गाड़ी से होती टक्करसब भागे जा रहे थे अपने

गलती करो पर पछतावा नहीं।

October 14, 2022

गलती करो पर पछतावा नहीं। गलती करो पर पछतावा की जगह,उस गलती से सीखो,पछतावे के दर्द में रोने की जगह,बल्कि

हर दिन करवा चौथ●

October 13, 2022

हर दिन करवा चौथ● जिनके सच्चे प्यार ने, भर दी मन की थोथ ।उनके जीवन में रहा, हर दिन करवा

ऐसा हमारा जीवन हो।

October 11, 2022

ऐसा हमारा जीवन हो। संतुष्टि और सहनशीलता हो,इंसान इंसानियत से मिलता हो,तकलीफ और कांटों के साथ साथ,सुगंधित पुष्प भी खिलता

PreviousNext

Leave a Comment