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Suturmurgi pravitti by Jitendra Kabir

 शुतुरमुर्गी प्रवृत्ति अगर तुम कहते हो कि ‘साहित्य रचना’ को मुक्त रखा जाए सर्वथा वर्तमान ‘सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों’ से, सत्ता के …


 शुतुरमुर्गी प्रवृत्ति

Suturmurgi pravitti by Jitendra Kabir

अगर तुम कहते हो

कि ‘साहित्य रचना’ को

मुक्त रखा जाए सर्वथा

वर्तमान ‘सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों’ से,

सत्ता के गलत फैसलों का कोई

विरोध न हो उसमें,

कुरीतियों की आलोचना 

न हो,

दबे-कुचलों की आवाज न हो,

शोषित को न्याय दिलाने की

पुकार न हो,

सच्चाई के पक्ष में हुंकार न हो,

बुराई को दुत्कारने की

रीढ़ न हो,

गली सड़ी व्यवस्था को बदलने की

उम्मीद न हो,

तो मेरे ‘दोस्त’

साहित्य के प्रति बहुत ही ‘संकीर्ण व एकांगी’

दृष्टिकोण है तुम्हारा,

लाख कर लो कोशिशें झूठा तिलिस्म रचाने की

वक्त का आइना दिखा ही देगा

इतिहास में असली रूप तुम्हारा।

                                              जितेन्द्र ‘कबीर’
                                              
यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है।
साहित्यिक नाम – जितेन्द्र ‘कबीर’
संप्रति- अध्यापक
पता – जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश
संपर्क सूत्र – 7018558314


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