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Super quick for special vs slow for common

 24 घंटे बनाम 72 घंटे ख़ास के लिए जबरदस्त फुर्ती बनाम आम के लिए सुस्ती   सुनिए जी ! आगे से …


 24 घंटे बनाम 72 घंटे

ख़ास के लिए जबरदस्त फुर्ती बनाम आम के लिए सुस्ती  

Super quick for special vs slow for common

सुनिए जी ! आगे से वोट उसी को दीजिएगा, जो शासन में आम जनता के लिए ऐसी फुर्ती से कम करें 

हर नागरिक, आम लोगों के लिए भी ऐसी सुशासन व्यवस्था चाहता है – एडवोकेट किशन भावनानी गोंदिया

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर कुछ ही दिनों में भारत का नाम चांद तक पहुंचने वालों की लिस्ट में चौथे नंबर पर होगा! सारी दुनियां विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र कीविकास गाथाओं को हसरत भरी नज़रों से देख रही है, परंतु यह अलग बात है कि मानसून सत्र 2023 में सभी बिल ध्वनि मत से पारित हो रहे हैं। जबकि आज देर रात राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार विधेयक 2023,131/102 से पारित हुआ। 20 जुलाई से शुरू हुआ सत्र 11 अगस्त तक हंगामा की भेंट चढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता जो दूरदर्शन पर आम जनता लाइव टेलीकास्ट देख रही है।खैर यह तो हम अनेक सत्रों में देख ही रहे है।जबकि 8-11 अगस्त 2023 तक अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा होगी।  परंतु आज दिनांक 7 अगस्त 2023 को आम और खास आदमी के चिंतकों को उनकी व्यथा का सटीक उदाहरण देखने को मिला कि कैसे पाबंदी और छूट एक खास आदमी के लिए जबरदस्त फुर्ती के साथ की जाती है और आम आदमी के लिए कैसे सुस्ती के साथ की जाती है इसको संक्षिप्त में जानने की करें तो, 24 मार्च 2023 को कैसे एकमाननीय कोर्ट आदेश के बाद 24 घंटे में उसकी संसदीय सदस्यता चली गई पूरी प्रक्रिया में जबरदस्त फूर्ती दिखाई गई। फिर 4 अगस्त 2023 को कोर्ट द्वारा उनके पक्ष में फैसला देने के बाद 72 घंटों में सचिवालय ने अधिसूचना जारी कर संसद सदस्य की बहाली की गई! वाह क्या बात है! गजब की फुर्ती है! आम आदमी के चिंतक ऐसी ही गज़ब की फुर्ती आज आम आम आदमी के लिए भी चाहते हैं, जो महीनों शासकीय कार्यालयों के चक्कर लगाते रहते हैं परंतु बिना दलालों, चायपानी भेटा चढ़ाने के फाइल आगे नहीं सरकती, परंतु दूसरी ओर हरे गुलाबी फेक कमाल देख, की तर्ज पर घर पहुंच सेवा दी जाती है। कागज घर बैठे दलाल देकर जाता है, यहां तक कि यदि किसी प्रक्रिया में सेतु एफिडेविट की ज़रूरत है तो वह भी आंखें फड़फड़ाते हुए 10 सेकंड का वीडियो भेज दो तो सर्टिफिकेट हाथ में मिल जाता है। हालांकि यह सब अंदर खाने होता है परंतु उपरोक्त जबरदस्त फुर्ती 24 घंटे बनाम 72 घंटे की प्रक्रिया जैसा आज हर नागरिक अपने कामों की फाइलों व्यवस्थाओं मेंसुशासन और व्यवस्था चाहता है और प्रण करता है कि आगे से वोट उसी को देंगे जो शासन में आम जनता के लिए  भी ऐसी फुर्ती से कार्य प्रक्रिया करें, क्योंकि यह पूरा वाक्य विश्व सहित भारत की 140 करोड़ जनता ने दूरदर्शन पर लाइव देखा है कि 24 घंटे बनाम 72 घंटे में पूरी प्रक्रिया हुई इसलिए आज हम मीडियामें उपलब्ध जानकारी टीवीचैनलों पर रिपोर्ट के सहयोग से इस आर्टिकल के माध्यम से चर्चा करेंगे, ख़ास के लिए जबरदस्त फुर्ति, आम के लिए सुस्ती। 

साथियों बात अगर हम जबरदस्त फुर्ती की विस्तृत जानकारी की करें तो, अदालत के फैसले के बाद 24 घंटे में ही 24 मार्च को युवा नेता की सांसदी चली गई थी लेकिन सांसदी की बहाली में थोड़ा वक्त लग गया। 4 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद विपक्ष नेता ने लोकसभा स्पीकर से मुलाकात की थी। पांच अगस्त को डाक के माध्यम से कोर्ट के आदेश के कागजात भेजे गए। फिर सात अगस्त को सचिवालय ने अधिसूचना जारी की। अब उम्मीज जताई जा रही है कि युवा को फिर से उनका सरकारी बंगला मिल जाएगा जो उन्होंने 14 अप्रैल को अपना ये आवास खाली कर दिया था।लोकसभा सदस्यता बहाल करने पर संसदीय कार्य मंत्री ने मीडिया से बात करते हुए कहा, स्पीकर ने आज फैसला लिया। हमने कानूनी प्रक्रिया का पालन किया और सुप्रीम कोर्ट का आदेश मिलने के तुरंत बाद हमने बहाल कर दिया। युवा नेता की आज 138 दिन बाद संसद सदस्यता बहाल हो गई। बता दें कि 23 मार्च को सूरत सेशन कोर्ट की तरफ से एक सरनेम केस में 2 साल की सजा मिलने के बाद युवा नेता की संसद सदस्यता चली गई थी। 

साथियों बात अगर हम पूरा मामला जानने की करें तो युवा नेता ने एक राज्य में 13 अप्रैल 2019 को चुनावी रैली में कहा था, नीरव, ललित, नरेंद्र का सरनेम कॉमन क्यों है? सभी चोरों का सरनेम ये क्यों होता है? उनके इस बयान को लेकर एकविधायक और पूर्व मंत्री ने उनके खिलाफ धारा 499, 500 के तहत आपराधिक मानहानि का केस दर्ज कराया था। अपनी शिकायत में विधायक ने आरोप लगाया था कि उन्होंने 2019 में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए पूरे इस समुदाय को कथित रूप से यह कहकर बदनाम किया कि सभी चोरों का सरनेम ये क्यों होता है? फ़िर सूरत की सेशन कोर्ट ने 23 मार्च को युवा नेता कोआपराधिक मानहानि के मामले में दोषी करार दिया था। इसके साथ ही उन्हें दो साल की सजा सुनाई गई थी। इसके बाद उन्होंने गुजरात एचसी में याचिका लगाकर निचली अदालत के फैसले पर रोक लगाने की मांग की थी। लेकिन हाईकोर्ट ने सेशन कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। जिसके बाद युवा नेता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया जहां उन्हें अंतरिम राहत मिल गई। 

साथियों बात अगर हम न्यायालय द्वारा राहत प्रदान करने और उसके प्रभाव की करें तो, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि इतनी ज्यादा सजा देने का कोई ठोस आधार नहीं बताया गया है। माननीय कोर्ट कहा कि इस मामले में अधिकतम सजा देने की क्या जरुरत थी? अगर एक साल 11 महीने की सजा दी जाती तो उनकी सदस्यता नहीं जाती। अधिकतम सजा से एक संसदीय क्षेत्र और वहां के लोग प्रभावित हुए हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने उनके खिलाफ आए फैसले पर रोक लगा दी। पीपल ऑफ रिप्रेजेंटेटिव एक्ट के तहत प्रावधान है कि अगर संसद के सदस्य को किसी भी आपराधिक मामले में दो साल की सजा होती है तो उनकी सदस्याता स्वत: रद्द हो जाएगी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद युवा की सदस्यता फिर से बहाल हो गई है। 

साथियों बात अगर हम राहत को संजीवनी बूटी की नजर से देखें तो, सबसे बड़ी बात अगर उच्चतम न्यायालय ने युवा नेता की सजा पर रोक नहीं लगाया होता तो वह 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में भाग नहीं ले पाते। इसके साथ ही वह 2029 तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो जाते क्योंकि कानून के मुताबिक दोषी सांसद सजा पूरी होने के बाद 6 साल तक चुनाव नहीं लड़ सकता। कोर्ट से राहत मिलने के बाद अगले कुछ महीने में होने वाले देश के 3 बड़े राज्यों के चुनावों में फायदा उठाने की कोशिश करेंगे। वह अपने साथ हुए ज्यादतियों के बारे में लोगों को बताकर वोट बटोरने की कोशिश करेंगे। युवा नेता को सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत पार्टी के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है। पार्टी के सबसे बड़े चेहरे को फिर से संसद में आने के बाद पार्टी का मनोबल बढ़ेगा। पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ ही देश की आम जनता को ये संदेश देने में कामयाब होगी कि केंद्र सरकार के हथकंडो से परेशान होकर भी युवा नेता ने सच का साथ नहीं छोड़ा और कोर्ट ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया।

साथियों इसलिए हमने इस पूरे प्रकरण का अध्ययन कर के यह देखे कि एक खास आदमी के लिए जबरदस्त फुर्ती से पूरी प्रक्रिया अपनाई गई जिसका आंकलन हमने घंटों में किया है। परंतु एक आदमी के लिए इसका आंकलन शायद महीनों और सालों से कम नहीं होगा जैसे कि हम शासकीय प्रशासकीय प्रक्रियागत कार्यों में देखते रहते हैं। 

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि 24 घंटे बनाम 72 घंटे। ख़ास के लिए जबरदस्त फुर्ती बनाम आम के लिए सुस्ती। सुनिए जी ! आगे से वोट उसी को दीजिएगा, जो शासन में आम जनता के लिए ऐसी फुर्ती से कम करें। हर नागरिक, आम लोगों के लिए भी ऐसी सुशासन व्यवस्था चाहता है।

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कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट किशन सनमुख़दास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट 

किशन सनमुख़दास भावनानी 
 गोंदिया महाराष्ट्र

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