Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

Shrad ka bhojan by Sudhir Srivastava

 श्राद्ध का भोजन कौआ बनकर मैं तुम्हारे घर की मुँडेर पर नहीं आऊँगा, अपने और पुरखों का सिर मैं झुकाने …


 श्राद्ध का भोजन

Shrad ka bhojan by Sudhir Srivastava

कौआ बनकर मैं तुम्हारे

घर की मुँडेर पर नहीं आऊँगा,

अपने और पुरखों का सिर

मैं झुकाने अब नहीं आऊँगा।

मेरी ही कमाई से तुम

ऐश करते आ रहे हो,

श्राद्ध के नाम पर 

सिर्फ़ नाटक कर रहे हो

सिर्फ़ दुनिया को दिखा रहे हो।

जीते जी तुमनें मुझे बेकार समझा

मरने से पहले ही तुमनें मार डाला,

मेरी दर्द पीड़ा को भी

नजरअंदाज तुम करते रहे,

प्यास से जब कभी हलकान होता

एक घूँट पानी भी मुँह में नहीं डाला।

आज जब मैं नहीं हूँ तब 

तुम क्यों ढोंग कर रहे हो?

खुद की नजरों में शायद गिर रहे हो

या समाज को लायक पुत्र होने का

आवरण ओढ़कर दिखा रहे हो।

पर ये सब अब बेकार है मेरे लाल

तुम्हारे मगरमच्छी आँसुओ का

क्यों करूँ मै ख्याल?

तुम्हारी माँ के आँसू 

मुझे बेचैन कर रहे हैं

तुम जैसे स्वार्थी बेटे के भरोसे

छोड़कर आने के लिए

मेरी आत्मा को कचोट रहे हैं,

हर पल आत्मा का सूकून छीन रहे हैं।

तुम्हारी माँ हर पल मुझे झंझोड़ती है

अपने पास बुलाने की 

जिद कर रही है।

अब तुम्हीं बताओ मैं क्यों आऊं?

तुम्हारे श्राद्ध का फेंका भोजन

आखिर क्यों खाऊँ?

माँ से भी छुटकारा पाने की 

तुम्हारी चाहत मैं भूल जाऊँ?

इससे अच्छा है अपनी पत्नी को भी

अपने पास ही बुलवा लूँ

सदा के लिए ही तुम्हारी उलझन

क्यों न खत्म करवाऊँ?

● सुधीर श्रीवास्तव

      गोण्डा, उ.प्र.

   8115285921

©मौलिक स्वरचित


Related Posts

अकेली होती कहां

June 24, 2022

 अकेली होती कहां डॉ. इन्दु कुमारी मेरे तो सब साथी  मैं अकेली होती कहां  हवा से भी बातें करती  पेड़

जल संरक्षण

June 24, 2022

 जल संरक्षण डॉ. इन्दु कुमारी जल ही जीवन है जीवन के संजीवन है इसे बचाना पुण्य कार्य  यही असली जनसेवार्थ।

लहरों से दोस्ती महंगी पड़ी हुज़ूर ज्वार उठा ऐसा की तैरना जानते हुए भी शख्सियत मेरी किनारे लगी

June 23, 2022

 “लहरों से दोस्ती महंगी पड़ी हुज़ूर ज्वार उठा ऐसा की तैरना जानते हुए भी शख्सियत मेरी किनारे लगी” भावना ठाकर

कितना कठिन होता है ना? माँ होना

June 23, 2022

 कितना कठिन होता है ना? माँ होना सिद्धार्थ गोरखपुरी बचपने से सबको खुश कर देना और जवां होना। बस उँगलियों

कविता – छाँव सा है पिता

June 23, 2022

 कविता – छाँव सा है पिता सिद्धार्थ गोरखपुरी गलतफहमी है के अलाव सा है पिता घना वृक्ष है पीपल की

कविता -आँखें भी बोलती हैं

June 23, 2022

 कविता -आँखें भी बोलती हैं सिद्धार्थ गोरखपुरी न जीभ है न कंठ है कहने का न कोई अंत है दिखने

PreviousNext

Leave a Comment