Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

story, कहानी

shikshit kisan – kahani

 शिक्षित किसान घनश्याम किशोर ही था, तभी उसके पिता की मृत्यु हो गई थी। मां और भाई बहनों का पूरा …


 शिक्षित किसान

घनश्याम किशोर ही था, तभी उसके पिता की मृत्यु हो गई थी। मां और भाई बहनों का पूरा उत्तरदायित्व अब उस पर ही आ पड़ा । घनश्याम की पढ़ने में बहुत रूचि थी, पर अब पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी  ।   यदि वह विद्यालय जाता तो खेतों को कौन संभालता  ?  अतः एवं वह शहर में से M.A. कि अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़कर गांव आ गया  ।। 

रिश्तेदार और पड़ोसी उसे कहते- ‘तुम इतना पढ़-लिख कर खेती करोगे ? अच्छा होता कि एक 2 वर्ष और पढ़कर शहर में ही नौकरी कर लेते।’

shikshit kisan

घनश्याम उन की बात टालते हुए कहता -`अरे भाई! पढ़ लिख कर खेती करने में बुराई ही क्या है  ? ‘

ऊंह ! खेती ही करनी थी तो पढ़ाई में इतना पैसा बर्बाद क्यों किया  ?’ वे तुनक कर कहते ।

घनश्याम हंसते हुए कहता-`भाई ! मैं तुम्हारी बात से सहमत नहीं !  पढ़ाई अपनी जगह है और खेती अपनी जगह पढ़ाई से हमारे व्यक्तित्व का विकास होता है और खेती जीविका का एक साधन है  । पढ़ा-लिखा होने से अच्छी तरह खेती करने में सहायता ही मिलेगी  !’

घनश्याम की बात सुनकर वह अपना-सा मुंह लेकर रह जाते  । 

चिढ़कर कहते- ‘हम ठहरे अनपढ़,  गंवार, वज्रमूर्ख । तुम पढ़े-लिखे समझदार हो । जैसा ठीक समझो वैसा करो ।`

कई व्यक्तियों की निगाहें घनश्याम के खेतों पर थी । वे सोचते थे कि दूसरे लड़कों की भांति उसे भी शहर की हवा लग गई होगी  । खेती करना पसंद ना करेगा । वे उसे बहला-फुसलाकर खेत बेचने के लिए तैयार कर लेंगे और सस्ते में उसके  खेत खरीद लेंगे । परंतु घनश्याम के दृढ़ निश्चय ने उन  सबकी इच्छा पर पानी फेर दिया । 

उन्होंने घनश्याम के पिता की तेरहवीं के समय भी उसे बहुत भरा था- `देखो बेटा ! पिताजी का यह अंतिम कार्य है । बेचारे सदैव तुम लोगों के लिए करते रहे   । अब तुम्हारा भी कर्तव्य है कि उनकी तेरहवीं खूब जोरो से करो, और गांव भर मे  बता दो जिससे स्वर्ग में बैठी उनकी आत्मा प्रसन्न हो सके ।’

घनश्याम ने विनम्र परंतु दृढ़ स्वर में कह दिया- ‘काकाजी ! मैं इसमें विश्वास नहीं करता कि गांव भर को भोज देने से पिताजी की आत्मा संतुष्ट होगी, ना ही मेरे पास इतना पैसा है ।’

छी  ! तुम तो पढ़-लिखकर पूरे नास्तिक बन गए हो ।’ आखिर तुम्हारे खेत किस दिन काम आएंगे ?’ जग्गू काका मुंह सिकोड़ते  हुए बोले ।

घनश्याम कहने लगा-‘खेत मेरी मां के हैं । मैं उन्हें कहीं नहीं बेचूंगा  । स्वर्गीय पिता जी के प्रति मेरी भी भावना है, मेरी भी श्रद्धा है  ।

फिलहाल तो मैंने उनके नाम ₹50 मानसिक की छात्रवृत्ति गरीब छात्रों को देने का निश्चय किया है ।’

‘हुंह ! बेकार की बात है यह  । इससे कहीं पितरों की आत्मा संतुष्ट होगी ।’ जग्गू काका ने मुंह बना कर कहा और इसी तरह लगे बड़बड़ाने ।

घनश्याम चुप रहा। उसे पता था कि गांव के बड़े बूढ़े सभी उसकी बात का विरोध करेंगे।

पिता की पैरवी के बाद से ही गांव के बड़े बूढ़े धन श्याम से  खींचे खींचे रहने लगे। परंतु वह सब का सम्मान करता, सबसे अच्छा व्यवहार करता। बड़ों के द्वारा उपेक्षा और तिरस्कार किए जाने पर भी वह  कभी उनकी अवज्ञा ना करता । 

घनश्याम पूरी मेहनत से खेती करने में जुट गया। वह खेती से संबंधित पुस्तकें पढ़ता रहता। लोग मजाक करते-‘हल चलाने में यह पुस्तकें काम नहीं आएंगी धन श्याम!’ पर उस समय वह हंसकर रह जाता । सोचता, मैं नहीं मेरी खेती ही आप सब को उसका उत्तर देगी ।

उस वर्ष गांव में सबसे अच्छी खेती धनश्याम की हुई । सभी दंग थे कि कल का यह अनुभवहीन छोकरा कैसे बाजी मार ले गया, केम छो मजामा। जग्गू कथा के एक साथी से ना रहा गया और उसने इसका रहस्य उससे पूछ लिया।

‘मैं बिल्कुल ही अनुभव से रहित तो नहीं था । पिताजी के साथ खेती में काम करवाता था। खेती के मौलिक सिद्धांतों की मुझे जानकारी थी । अब पूरा समय इसी के लिए देने पर मुझे पुस्तकें पढ़ने का अवसर मिला।मेरी अच्छी खेती मेरे पिछले अनुभव और अब पुस्तकों से मिले ज्ञान का ही फल है।हम सोचते हैं कि पढ़ाई केवल नौकरी के लिए की जाती है और और ऐसी बात नहीं है किताब में हमें जीवन के हर क्षेत्र की जानकारी देती हैं और सहायता करती हैं।

घनश्याम की खेती जब कई बार अच्छी हुई तो अन्य व्यक्ति भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके।खेती के विषय में आधुनिक जानकारी पानी उससे फसल को अच्छा बनाने के लिए अब दूसरे किसान भी उसके पास आने लगे।।  घनश्याम खुशी खुशी उन्हें सब बताता ।  वह समय-समय पर आसपास लगने वाले कृषि मेलों में भी जाता  । धीरे-धीरे दूसरे किसान भी इनकी उपयोगिता समहझने लगे और धनश्याम के साथ जाने लगें ।

घनश्याम ना केवल अपने विषय में ही सोचता था अपितु उसमें पूरे गांव के लिए कुछ करने की उमंग थी  ।  वह चाहता था कि उसके गांव का खूब विकास हो  । इसके लिए वह शिक्षा को आवश्यक समझता था  ।  शहर में धनश्याम के कुछ व्यक्ति परिचित थे। उसने भाग-दौड़ करके गांव में प्रौढ़ पाठशाला और अस्पताल खुलवाया  । बच्चों का स्कूल गांव में पहले से था, पर उनमें अध्यापक महीने में दस दिन ही आते थे  । धनश्याम ने शिक्षा अधिकारियों से शिकायत करके उनकी पढ़ाई भी नियमित कराई  । गांव की गन्दगी के विरुद्ध भी उसने अभियान छेड़ा ।

उसने कुछ युवकों की टोली बनाईं,  जो मिलकर हर सप्ताह पूरे गांव की सफाई करती थी।  साथ ही वह ग्रामीणों को घर साफ-सफाई रखने के लाभ भी समझाते रहते थे  । गांव की सीमा पर पहले जहां घूरें के ढेर रहते थे वहां अब धनश्याम के प्रयत्त से कम्पोस्ट खाद के गड्ढे बनने लगे  । अपने समवयस्क साथियों को संगठित कर उसके `ग्राम्य युवा दल’ बना लिया  ।


Related Posts

कहानी-आखिरी फैसला (hindi kahani)

February 24, 2022

कहानी-आखिरी फैसला (hindi kahani)   चंँदू बाबू अपने घर से अचानक गायब हो गये थें l नहीं चंँदू बाबू कोई बच्चे

कहानी -अंतिम बार

February 24, 2022

कहानी -अंतिम बार ” बाबू, ई प्योर शीशम के लकड़ी हौ l चमक नहीं देखत हौ , और हल्का कितना

कहानी-बदरंग जिंदगी (hindi kahani)

February 24, 2022

 कहानी-बदरंग जिंदगी (hindi kahani)   दामोदर को एहसास हुआ कि उसे फिर, से पेशाब लग गई है। पता नहीं उसका गुर्दा

कहानी विधुर का सिमटा दर्द (hindi kahani)

February 24, 2022

कहानीविधुर का सिमटा दर्द (hindi kahani)   आज बहुत दिनों बाद परेशभाई आए थे।वैसे तो कोई रिश्ता नहीं था हमारे साथ

Short Story- Gelly – R.S.meena Indian

February 14, 2022

Short Story- Gelly Golu was just sitting down to eat when a squirrel She came in front of the bouncing

बीमारी द्वारा रोगी का चयन–कहानी

February 3, 2022

बीमारी द्वारा रोगी का चयन छोटे थे तो और सभी कहानियों के साथ ये कहानी भी मां सुनाया करती थी।एक

PreviousNext

Leave a Comment