शब्दों की चोट
उस खाई के विरुद्ध ।
कभी जुदा करती है ।
चिंगारी पैदा करती है।।
8800784868
शब्दों की चोट शब्दों की चोट जब पड़ती है। चित्त में चेतना की चिंगारी निकलती है।। जैसे बसंत में भी …
June 27, 2021
धरती सजा दें आएं हम सब मिलकर धरती को यूं सजा दें। पेड़ों की कतारें लगा दें इस अवनि को
June 27, 2021
गीत – सावन बरसे सखी बरसे रे सखी रिमझिम पनिया चमकै रे सखी मेघ में बिजुरिया। छमकत रे सखी गांव
June 27, 2021
मुक्ति किसी डांट-डपट से बेपरवाह हो मन चाहता है खेलना मनमफिक़ खेल जो बन्धे न हों बहुत अनुशासन मेँ परे
June 27, 2021
चोर छिपा बैठा है मन में चोर छिपा बैठा है मन में मैं ढूंढ रहा हूं दूसरे तन में, कैसी
June 27, 2021
संवेदना विहीन हम संवेदना विहीन हम बांट पाय दर्द कौन। अनाथ तो बना गया, प्रकृति भी मौन क्यों ? दर्द
June 27, 2021
हमारे संस्कार माना कि आधुनिकता का मुलम्मा हम पर चढ़ गया है, हमनें सम्मान करना जैसे भुला सा दिया है।
Nice poem