Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

sabhya samaj ki darkar by jitendra kabir

 सभ्य समाज की दरकार “हमें क्या लेना दूसरों के मामलों में पड़कर” ऐसा सोचकर जब जब हमनें देख कर अनदेखा …


 सभ्य समाज की दरकार

sabhya samaj ki darkar by jitendra kabir

“हमें क्या लेना दूसरों के

मामलों में पड़कर”

ऐसा सोचकर

जब जब हमनें देख कर अनदेखा किया

किसी मजलूम पर होता अत्याचार,

तब तब उस कृत्य को बढ़ावा देने में

हम भी हुए परोक्ष रूप से जिम्मेदार,

हम मानें या न मानें

हर बात का हल नहीं है सरकार,

एक सभ्य एवं जागरुक समाज के तौर पर भी

अभी हमें काफी करना है सुधार।

“हम क्या करें अगर उसने

संपत्तियां बना लीं रिश्वतें खाकर”

ऐसा सोचकर

जब जब हमनें देख कर अनदेखा किया

अपने आस-पास पलता भ्रष्टाचार,

तब तब उस बुराई को बढ़ावा देने में

हम भी हुए परोक्ष रूप से जिम्मेदार,

हम मानें या न मानें

हर जगह नहीं पहुंच सकती सरकार,

खात्मा करने के लिए इस बुराई का जड़ से

जनता को ही करना होगा आखिरी प्रहार।

“हम क्या करें किस्मत में ही बदी होगी

 उसके मुसीबत तो रहेगी होकर”

 ऐसा सोचकर

 जब जब हमनें सहायता के लिए किया

 किसी बड़े जरूरतमंद इंसान को इनकार,

 तब तब समस्या को बढ़ावा देने में

 हम भी हुए परोक्ष रूप से जिम्मेदार,

 हम मानें या न मानें

 हर दुःख दूर नहीं कर सकती सरकार,

 एक-दूसरे के सुख-दुख में काम आने को

 हमें ही रहना पड़ेगा स्वेच्छा से तैयार।

 

                                     जितेन्द्र ‘कबीर’

                                     

यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है।

साहित्यिक नाम – जितेन्द्र ‘कबीर’

संप्रति – अध्यापक

पता – जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश

संपर्क सूत्र – 7018558314


Related Posts

आया है नवरात्रि का त्योहार

October 16, 2023

आया है नवरात्रि का त्योहार आया है नवरात्रि का त्योहार।नवरात्रि में माँ का सजेगा दरबार।गली-गली गूँजेंगे भजन कीर्तन,माँ अंबे की

कविता – अश्रु | kavita – Ashru

October 14, 2023

कविता – अश्रु ये आसू नही मेरा क्रोध है,क्यू तुम्हे नही ये बोध है,कमजोर मत समझो तुम मुझे,यह तुम पर

कविता -अभिव्यक्ति का अंतस्

October 14, 2023

अभिव्यक्ति का अंतस् आहूत हो रही हैभाव की अंगडा़ईमन की खामोश और गुमसुम परछाई मेंकि कहीं कोई चेहरा… चेहरे की

मां है घर आई

October 14, 2023

मां है घर आई मां है घर आई चहुं दिग खुशियां छाईं झूम उठा है कण-कण माटी का हर चेहरे

कविता – बस आ जाओ

October 14, 2023

कविता  : बस आ जाओ सुनो दिकु….. मुज़ से कोई खता हुई है, तो बता दो ना रुख से अपने

ये अंधेरी रात| kavita: ye Andheri rat by veena adavani

October 9, 2023

ये अंधेरी रात ये तंहाई भरी अंधेरीगहरी काली रातहमे डराते हैं।। ये उमड़े घुमड़ते बादलदेख हम अक्सर कितनाडर जाते हैं।।

PreviousNext

Leave a Comment