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Roya Kabira samajh n paye by H.K. Mishra

 रोया कबीरा समझ न पाए रोया कबीरा दीन दुखियों पर, गाया कबीरा मोहताजों पर , संदेश दिया साखी पढ़ कर …


 रोया कबीरा समझ न पाए

Roya Kabira samajh n paye by H.K. Mishra

रोया कबीरा दीन दुखियों पर,

गाया कबीरा मोहताजों पर ,

संदेश दिया साखी पढ़ कर ,

तीखा बोला पाखंडों पर   ।।

हम समझ न पाए कबीरा को,

निराकार जो उनका अपना ,

दर्शन उनका जीवन मेरा ,

तत्व बताया बड़े ज्ञान का   ।।

रहस्यवाद पर कबीरा का ,

अनुभव उनका अपना था,

हम पाखंडी बने रहे , पर,

पढ़ा नहीं कभी-कबीरा को  ।।

ज्ञानी ध्यानी को जाने पर ,

नींद हमारी  खुलती है ,

हो जाती जब देर बहुत ,

हम उस पर पछताते हैं  ।।

कह गए कबीर सुनो साधु,

दुनिया नहीं ठौर ठिकाना है,

बार-बार कहता आया हूं ,

जीवन पानी का बुलबुला  ।।

वसुंधरा हरी भरी,

मरुधरा कैसे बनी,?

प्रयास तेरे पास है ,

चुनौती स्वीकार कर ।।

कबीर और रैदास को ,

एक साथ  झांक तू  ,

ज्ञान का भंडार जो,

परवाह किसको आज है ?

दिशा और दशा से ,

बहुत दूर आज हैं ,

साफ-साफ दिख रहा,

अंधकार मेरे पास है  ।।

रोया कबीरा समझ न पाए,

गंगा तट पर क्यों पछताए ,

उनका दर्शन उनका जीवन,

आओ मिलकर हम अपनाएं। ।।

गुरु भाई दोनों मिले ,

संत कबीर रैदास ,

मां गंगा प्रसन्न हुई,

अपने तट पर आप। ।।

गूंज उठा गंगा तट एक पल,

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी ,

भक्तों में थी होड़ लगी ,

भजन करे रैदासा ,,,,,

                       “

                      ” प्रभु जी तुम चंदन हम पानी”

मौलिक रचना

                   डॉ हरे कृष्ण मिश्र

                   बोकारो स्टील सिटी

                   झारखंड ।


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