Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

Priye ke desh by Indu kumari

 प्रिय के देश तुम भी  उनके  हो प्रिय, मैं  भी उनकी  प्रियतमा। जिसे ढूँढती  है अन्तर्मन, पूजती  है   सारा   जहाँ …


 प्रिय के देश

Priye ke desh by Indu kumari

तुम भी  उनके  हो प्रिय,

मैं  भी उनकी  प्रियतमा।

जिसे ढूँढती  है अन्तर्मन,

पूजती  है   सारा   जहाँ

 जिस प्रिय के हो आशिक

उनसे आशिकी  है  मेरी

शिद्दतों से बिछुड़े है हम

कायनात भी करती यादें

दर-दर  करती फरियादें

खोजती है कई रूपों में

अळख  हमारे है अन्दर

बस राह भटक गये  हैं

खाक छाना करते  हम

वो मिलते हैं प्रेम वन में

सूरत की नाव बनाकर,

प्रिय  के  देश चलें हम।

         डॉ.इन्दु कुमारी
मधेपुरा बिहार


Related Posts

Bhookhe ki darm-Jat nhi hoti by Jitendra Kabir

October 23, 2021

 भूखे की धर्म – जात नहीं होती इस कविता को पढ़ने वाला उनमें नहीं आता लिखने वाला भी नहीं, इसलिए

Maa siddhidatri by Sudhir Srivastava

October 23, 2021

 माँ सिद्धिदात्री नवम रुप माँ जगदम्बे का माँ सिद्धिदात्री कहलाती है, शंख, चक्र,गदा, कमल मैय्या धारण करती है। कमल आसन

shoonya kavita by Jitendra Kabir

October 22, 2021

 शून्य  “तुमने मेरे लिए अब तक किया ही क्या है?” गुस्से के आवेश में अक्सर बोल दिए जाने वाले यह

Mohak rash leela by vijay Lakshmi Pandey

October 22, 2021

 मोहक रास लीला…!!      मुग्ध  कर देनें  वाला  अनुपम  लावण्य  , सुबह  की  धूप  सा छिटका  हुआ सौंदर्य ,साँझ 

Aajkal ke siyashtdan by Jitendra Kabir

October 22, 2021

 आजकल के सियासतदां मारना जो हो कभी ‘श्वान’ तो दे कर उसे पागल करार खूब कर दो बदनाम ताकि जब

Aarya sabhayata meri by Dr. H.K. Mishra

October 22, 2021

 आर्य सभ्यता मेरी मानव सभ्यता धरा धाम का, प्राचीन धरोहर अपना है , सिंधु तट पर विकसित होकर, घाटी घाटी

Leave a Comment