Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

Naari by kamal siwani ramgadh bihar

 नारी होती जहाँ नारी की पूजा , वहाँ देव बसते हैं । है वह देवी रूप जगत में , ग्रंथादिक …


 नारी

Naari by kamal siwani ramgadh bihar


होती जहाँ नारी की पूजा , वहाँ देव बसते हैं ।
है वह देवी रूप जगत में , ग्रंथादिक कहते हैं ।।
नारी की मर्यादा तो , युग -युगों से विदित है ।
जग की रचना उसी की , महिमा से ही सज्जित है ।

लेकिन कतिपय जन कहते , नारी को त्याग का हिस्सा ।
और उसे साबित करने को , गढ़ते नाना किस्सा ।।
आए दिन इस मसले पर वे , हैं सर शब्द चलाते ।
और नारी की महिमा का हैं , अतिशय मान घटाते ।।

कहते निज नारी को त्यागे , होता अविचल मन है ।
विषतुल्य -सा उसे बताना , उनका नीति कथन है ।।
पत्नी के साहचर्य को कहते , धर्म-कर्म में बाधा ।
इस तरह नारीगण की वे , करते क्षीण मर्यादा ।।

इसी हेतु इस मसले पर हैं , कुछ उद्गार भी मेरे ।
वधू के संग क्या अधम काज हैं , वैवाहिक के फेरे ?
नारी को अपमानित कर जो , नीति शब्द सुनाते ।
उन हाथों से बना जो भोजन , बैठ मगन हो पाते ।।

भक्तजनों के घर में गर जो , नहीं नारियाँ होतीं ।
उन द्वारों पर ज्ञान प्रदाता , नहीं तोड़ते रोटी ।।
काम -धाम के बाद सेवक जन , भोजन कहाँ बनाते ?
जमा आसनी खुद न और , गैरों को खिला ही पाते ।।

नारी है जब विषतुल्य तो , क्योंकर उससे जन्मे ?
कहते बुरा उसी को जिसका , खून तुम्हारे तन में ।।
दूध पिला और पाल- पोस कर , जिसने बड़ा बनाया ।
सर्व न्योछावर करके अपना , धरती पर ले आया ।।

जो रोने पर रोती आपके , और गाने पर गाती ।
उसी मात को नीच बताते , तनिक शर्म नहीं आती ?
नारी ही तो नाना रूप में , जीवन काल में आती ।
बेटी ,बहन , माता और दादी , सब कुछ वही कहाती ।।

वही तो हम को पल्लवित पुष्पित , करती सदा ही जग में ।
तन -मन का हर संबल देती , सदा जीवन के मग मेंं ।।
माँ के दूध का कर्ज़ जगत में , कौन चुका सकता है ?
बहन के बिन कलाई राखी , कौन बाँध सकता है ?

दादियों का दर्द उर का , पोतों हेतु जो होता ।
वंशबेलि ना सूखने पाए , उनको सदा संयोता ।।
फिर क्यों निर्लज्ज भाव से कहते , नारी नरक की खानी ?
क्या यह पातक कर्म न तेरा , बोलो रे अज्ञानी ?

जिस नारी ने जीवन जिया , त्यक्ता रूप में होकर ।
उसने अपना सारा जीवन , काटा हर पल रोकर ।।
दो पहियों का संगम है जब ,जीवन की यह गाड़ी ।
तो फिर क्यों एकांगीपन की , गाते महिमा सारी ?

जीवन की उपलब्धि पाना , आप पे ही निर्भर है ।
किसी भाँति नारी पर लाँछन , कभी नहीं हितकर है ।।
हुए अनेक . संपूज्य .जिन्होंने , नारी को नहीं छोड़ा ।
कतिपय मुनिवर जन रहे जो , तनिक मुँह ना मोड़ा ।।

शंकर, विष्णु आदिक जन क्या , साथ नहीं चलते थे ?
क्या वे कभी नारी को अपनी , विषादिक कहते थे ?
एक से बढ़कर एक विदुषी , हुई जगत में नारी ।
जिनकी महिमा से सुवाषित , रही धारित्री सारी ।।

फिर क्यों तू उसको पथ-कंटक , आए दिन बताते ?
देवी रूप जो हैं वसुधा पर , उनका मान घटाते ?
—- कमल सीवानी , रामगढ़ ,सीवान ,बिहार


Related Posts

कन्यादान नहीं, कन्या-सम्मान।

August 30, 2022

कन्यादान नहीं, कन्या-सम्मान। यह कैसा शब्द है कन्यादान, कौन करता है अपनी जिंदगी को दान,माता- पिता की जान से बढ़कर,कैसे

हां मैं हूं नारीवादी!

August 28, 2022

हां मैं हूं नारीवादी! नारीवाद के प्रमुख प्रकार, स्‍त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार,ऐसा विश्‍वास या सिद्घांत,भेदभाव का हो देहांत,और

खुद गरीब पर बच्चों को अमीर बनाते हैं पिता

August 28, 2022

कविता: खुद गरीब पर बच्चों को अमीर बनाते हैं पिता खुद गरीब पर बच्चों को अमीर बनाते हैं पिता  कभी

कब प्रशस्त होगी हर नारी

August 25, 2022

“कब प्रशस्त होगी हर नारी” अब एक इन्कलाब नारियों की जिजीविषा के नाम भी हो, तो कुछ रुकी हुई ज़िंदगियाँ

वजह-बेवजह रूठना

August 25, 2022

वजह-बेवजह रूठना। वजह-बेवजह क्यों बार-बार रूठना,छोटी-छोटी बातों पर बंधनों का टूटना,क्यों ना जीवन में समझदारी दिखाएं,शिष्टाचार, प्रेम और स्वाभिमान के

कविता -शहर

August 22, 2022

शहर गांवों के सपने  संभाल लेता है शहर  हो जाओ दूर कितना भी पास बुला लेता है शहर । गांवों

PreviousNext

Leave a Comment