Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

Mohak rash leela by vijay Lakshmi Pandey

 मोहक रास लीला…!!      मुग्ध  कर देनें  वाला  अनुपम  लावण्य  , सुबह  की  धूप  सा छिटका  हुआ सौंदर्य ,साँझ  …


 मोहक रास लीला…!!

Mohak rash leela by vijay Lakshmi Pandey

     मुग्ध  कर देनें  वाला  अनुपम  लावण्य  , सुबह  की  धूप  सा छिटका  हुआ सौंदर्य ,साँझ  की जैसी  लटकती  अलकें ,दुपहरिया जैसा रुतबा ।

         ऐसी  ही  तो थीं नव यौवनाओं  की टोली  जिन्हें कृष्ण  कान्त  का  आमंत्रण मिल चुका  था और रास लीला  में   समाहित हो जानें को आतुर  शीघ्र  ही घर के कार्य   निबटानें  में जुटी  थीं , सहसा  कृष्ण  की  बंशी  बज  उठी ।

      बेसुध  सी   उतावली  जा  पहुँची  गोपिकाएँ  ,अद्भूत वृन्दावन  शरद  पूर्णिमासी   की  चाँदनी  चहुँओर  छिटकी  हुई 

 वाद्ययंत्र  सम्भाले  गये  ,मधुर -मधुर  संगीत  से  सराबोर ,आनन्दित  वातावरण  ,रसमय पाजेब  की  छनछन  , कंकण की  खन  खन  के बीच  ठिठोली  करती  गोपिकाएँ  ।कृष्ण कान्त  के  इर्द –  गिर्द  मंडराती मनोरम  दृश्य  ।

     वातावरण  मधुरिम  हो  चला  । अहा …!  पवन  ने भी

झोंके  लिए  ,बेसुध  सी गोपबालायें  प्रेम  रस  पीनें को उतावली  ,मूंदे  नैंन  नशीली  चितवन  ,चटकीली  पंच तोरिया  चुनर में  इतराती  ,कृष्ण  कान्त  ही कहाँ  रोक  पाते  स्वयं  को  । समय  से पूर्व  ही  बाँसुरी  टेर  देते  ।

    थिरक  उठे  पाँव  ,बज  उठे  घुँघरू ,यमुना  हिल्लोरे  लेनें  लगीं  मनो उठकर  वातावरण  में  तिरोहित  हो  जाना  चाहती  हो ,बड़ा ही  अद्भूत  मनोरम  दृश्य …

            बंशी  की  धुन  पर  थिरक  रही,

            वह  कृष्ण कान्त की अनुहारिन।

            सुन्दर    सुखमय     पूरनमासी ,

            है  छिटक  रही  चहुँओर चांदनी।।

            

             यमुना  ले     हिल्लोरें       गातीं,

             पवन    झकोरे  संग  बलखाती।

             बरस      रही    पुष्पावली जहँ

             दरशन  को  देव   तरसते  तहँ ।।

             श्री “लक्ष्मी”  आईं सखियन संग,

             “विजया”  आईं श्री  लक्ष्मी संग।

               वर्णन  के   वर्णन  कहि न जाय,

             श्री  श्याम विराजे  गोपिन  संग।।

               यह अद्भूत  महिमा  मोहन  की,

               हैं     मोहि    रहे  त्रिलोकी  को।

               पावन    धरती    वृन्दावन   की,

               जहँ  मोहन बसते कण-कण में।।✍️

                

               जय कृष्ण कृष्ण राधे कृष्णा

               जय कृष्ण कृष्ण राधे कृष्णा

               श्री कृष्ण चन्द्र राधे  कृष्णा

             ! ! श्री कृष्ण चन्द्र  राधे  राधे !!

              जय जय कृष्ण कृष्ण राधे कृष्णा

              श्री कृष्ण चन्द्र राधे राधे जय जय

              कृष्ण कृष्ण   राधे राधे   राधे राधे

            !! कृष्णा कृष्णा श्री कृष्ण चन्द्र राधे !!

         

                        विजय  लक्ष्मी  पाण्डेय
                        एम. ए., बी.एड.(हिन्दी)
                         स्वरचित मौलिक रचना
                                 आजमगढ़ ,उत्तर प्रदेश


Related Posts

सलोनी के कुसुम”- अनिता शर्मा झाँसी

January 25, 2022

सलोनी के कुसुम” इंसान बेइन्तहा मजबूर दिखा,कुसुम सी बालिकाएं तीर्थ पर,बेंच रही पूजा का सामान छोली में।चेहरे पर मुस्कान बिखेरी

हवाओं से बात- डॉ. माध्वी बोरसे!

January 25, 2022

हवाओं से बात! सनन सनन सी हवा मैं सांस लेते हुए खुलकर, जीते हैं अपने सारे दुख गम को भूल

संगीत-डॉ. माध्वी बोरसे!

January 25, 2022

संगीत! एक मधुर सी ध्वनि जब कानों में गुनगुनाती,मन को प्रसन्नता से भर जाती,योग की तरह होता है संगीत,हर एक

आभासी दुनियाँ- सरस्वती मल्लिक

January 25, 2022

आभासी दुनियाँ अद्भुत है बहुत ,यह आभासी दुनियाँप्यारी है बहुत ,जैसे सपनों की दुनियाँमित्र मिले यहाँ बहुत ,बनी नए रिश्तों

तू डोर मैं पतंग- अनिता शर्मा झाँसी

January 25, 2022

तू डोर मैं पतंग ईश्वर के हाथों में जीवन डोर-हम पतंग जैसे उड़ रहे।खींचता और ढील देता विधाताहम नाचते अंहकार

देश के वीर सपूतों में वीरांगना- डॉ. इन्दु कुमारी

January 25, 2022

देश के वीर सपूतों में वीरांगना वीरता की श्रृंखला में जुड़करप्रहरी बन आ रही है बहनाभाई हिम्मत नहीं है हारनाचल

Leave a Comment