Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

Meri abhilasha kavita by sudhir Srivastava

 मेरी अभिलाषा मेरे मन की यह अभिलाषा पूरी हो जन जन की आषा, मिटे गरीबी और निराशा संस्कार बन जाये …


 मेरी अभिलाषा

Meri abhilasha kavita by sudhir Srivastava

मेरे मन की यह अभिलाषा

पूरी हो जन जन की आषा,

मिटे गरीबी और निराशा

संस्कार बन जाये परिभाषा।

          सबको शिक्षा, इलाज मिले

          अमीर गरीब का भाव हटे,

          बेटा बेटी का अब भेद मिटे

          मेरे मन की यह अभिलाषा।

गंदी राजनीति न हो

वादे सारे ही पूरे हो

जिम्मेदारी भी तय हो

अपनी भी जिम्मेदारी हो।

            स्वच्छ रहें सब नदियां नाले

            कहीं तनिक न प्रदूषण हो,

            अतिक्रमण का नाम न हो

            कानून व्यवस्था का राज हो।

त्वरित न्याय मिले सबको

मन में भेद तनिक न हो,

किसी बात का खौफ न हो

जग में खुशियाँ अपार हो।

            मरने मारने का भाव न हो

            सीमा पर भी न तनाव हो,

            भाई चारा सारे संसार में हो

            सबके मन में प्रेमभाव हो।

मँहगाई का वार न हो

प्रकृति मार कभी न हो,

चिंता की कोई बात न हो

मन मेंं कपट विचार न हो।

            सामप्रदायिक दंगे न हों

            जाति धर्म की बात न हो,

            सब चाहें सबका हित हो

            खुशियों का भंडार भरा हो।

सामाजिक कुरीति न हो

बहन बेटियों में न डर हो,

नशे का व्यापार न हो

मेरे मन की अभिलाषा।

✍ सुधीर श्रीवास्तव

        गोण्डा, उ.प्र.

      8115285921


Related Posts

कैसे कोई गीत सुनाये-आशीष तिवारी निर्मल

January 6, 2022

कैसे कोई गीत सुनाये कितने साथी छूट गएसब रिश्ते नाते टूट गएपल-पल मरती आशाएंजब अपने ही लगें परायेकैसे कोई गीत

प्रणय जीवन- डॉ हरे कृष्ण मिश्र

January 6, 2022

प्रणय जीवन प्रेम जीवन में प्रवाहित,प्रेम से जीवन जुड़ा है,प्रेम का परिणाम हम हैं,प्रेम को जीवन समर्पित ।। जिंदगी पर्याय

जीने का अनुराग नहीं – डॉ हरे कृष्ण मिश्र

January 6, 2022

जीने का अनुराग नहीं प्यासी है नदियां प्यासा है सावन,बर्षा की बेला प्यासा है चातक ,प्यासी है धरती प्यासा है

राधा की पीड़ा- डॉ हरे कृष्ण मिश्र

January 6, 2022

राधा की पीड़ा चल केशव बरसाना जाना,रूठ गयी जहां राधा रानी ,वृंदावन को भूल गयी है ,अपनों से भी रूठ

देर लगेगी- सिद्धार्थ गोरखपुरी

January 6, 2022

देर लगेगी बदल गया जमाना है…. जरा देर लगेगीन कोई ठौर ठिकाना है…..जरा देर लगेगीतुम होते जो कुत्ते! तो लेते

बताओ न कैसे रहते हो ?–सिद्धार्थ गोरखपुरी

January 6, 2022

सड़क किनारे रहने वाले ग़रीब बेघरों को समर्पित रचना-बताओ न कैसे रहते हो मौसम ठंडा सूरज मद्धमऊपर से बदन पर

Leave a Comment