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Mera beta happy kavita by vijay Lakshmi Pandey

    ” मेरा बेटा हैप्पी” मेरा बेटा मिट्टी खाता , बहुत बड़ा दुर्गुण है यह। हर समय शिकायत सुन …


 

  ” मेरा बेटा हैप्पी”

Mera beta happy  kavita by vijay Lakshmi Pandey

मेरा बेटा मिट्टी खाता ,

बहुत बड़ा दुर्गुण है यह।

हर समय शिकायत सुन -सुन कर,

थक गए कान अब रहनें दो।

है खेल रहा जैसे तैसे ,

जो जी में आये करनें दो।

यह नट-खट रोता रहता है,

सारा दिन बक-बक करता है।

खेल -खिलौनें नहीं चाहिए ,

पल्लू पकड़े रहता है ।

तुतला-तुतला कर बोल रहा,

प्रति क्षण उलझाए रखता है ।

यह “तीन” बरस का “बेटा” है,

हर समय ख़ुशामद करवाता।

रो -धो कर अपनीं सारी जिद 

कैसे  ही पूरी करवाता ।

ये बाल रूप ,अनजान रूप ,

ये क्या करते ,ये क्या जानें ।

इनके भी अपनें काम बहुत ,

जो हमसे मेल न खा पाते ।

यह क्या ??? ये ज़िद ले बैठे ,

यह वस्त्र नहीं जँचता मुझको ।

मैं नहीं पहनता ले जाओ ,

कोई अच्छा सा ले आओ ।

या यूं ही मैं स्कूल चला !!

उलझा -बिखरा मैला-मैला ।

दोनों हाथों में चॉक लिए ,

थैले को रेतों से भरकर  ।

क्या हाल बनाया है अपना ,

अब लिपट रहे मुझसे आकर ।

हमनें जो इनको टोक दिया ,

ये जमा रहे हैं रौब बड़ा ।

मत भरो हाज़िरी बच्चों की ,

लाओ रोटी खोलो डिब्बा ।

मैं दंग हुई क्या करूँ हाय !!

है समय -चक्र पहला -पहला,

क्या हाल बनाएंगे “हजरत”

आते-आते अंतिम घण्टा ।।✍️✍️

         विजय लक्ष्मी पाण्डेय

        एम. ए., बी.एड.(हिंदी)

        स्वरचित  मौलिक रचना

        विधा –  एक संस्मरण

             आजमगढ़,उत्तर प्रदेश


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