Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

Mai ek adhyapak hu by Jitendra Kabir

 मैं एक अध्यापक हूं… एक बच्चे को  उसकी क्षमता के अनुसार समाज में स्थान दिलाना चाहता हूं, मैं एक अध्यापक …


 मैं एक अध्यापक हूं…

Mai ek adhyapak hu by Jitendra Kabir

एक बच्चे को 

उसकी क्षमता के अनुसार

समाज में स्थान दिलाना चाहता हूं,

मैं एक अध्यापक हूं…

अपने पढ़ाए बच्चों की सफलता के अलावा

और कोई गुरु-दक्षिणा उससे नहीं चाहता हूं।

एक बच्चे को

उसकी प्रतिभा के हिसाब से

तराश कर चमकता हीरा बनाना चाहता हूं,

मैं एक अध्यापक हूं,

अपने पढ़ाए बच्चों को कामयाब होते देख

मेहनत पर अपनी इतराना चाहता हूं।

एक बच्चे को

जीवन में आने वाली चुनौतियों से

भली-भांति निपटना सिखाना चाहता हूं,

मैं एक अध्यापक हूं…

अपने शिष्यों के सर्वांगीण विकास में ही

अपना मूल्यवान समय लगाना चाहता हूं।

एक बच्चे को

देश, समाज एवं मानवता के कल्याण हेतु

सद्भावना का दूत बनाना चाहता हूं,

मैं एक अध्यापक हूं…

अपनी दी गई शिक्षाओं के माध्यम से

विश्व-बंधुत्व का संदेश फैलाना चाहता हूं।

                                     जितेन्द्र ‘कबीर’

यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है।

साहित्यिक नाम – जितेन्द्र ‘कबीर’

संप्रति – अध्यापक

पता – जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश

संपर्क सूत्र – 7018558314


Related Posts

प्रकृति की गोदी- डॉ हरे कृष्ण मिश्र

December 15, 2021

प्रकृति की गोदी ध्यान साधना वरदान प्रकृति की,हम शोध खोज न कर पाते हैं ,पूर्ण प्रकृति हमारी ध्यान मग्न है

एक समय था – अनीता शर्मा

December 15, 2021

एक समय था एक समय था–जब साथ सभी रहते थे। चाचा चाचाजी और बच्चे–ताऊ ताई और बच्चे। कितना बड़ा परिवार

अगले जनम मोहे नारी ही कीजो – डॉ. माध्वी बोरसे

December 13, 2021

अगले जनम मोहे नारी ही कीजो! अगले जनम मोहे नारी ही कीजो,दोबारा मेरे माता-पिता को, प्यारी सी बिटिया ही दीजो,फिर

ना होता मासिक धर्म, ना होता तेरा जनम- डॉ. माध्वी बोरसे

December 13, 2021

ना होता मासिक धर्म, ना होता तेरा जनम! कुदरत से दी गई चीजें, कभी खराब नहीं होती, अगर मासिक धर्म

श्रद्धांजलि-नंदिनी लहेजा

December 10, 2021

श्रद्धांजलि नम हैं हिंदुस्तान आज , जो खोया वीर सपूत।जीवन साथी संग उनके,जाबांज़ वीर भी, क्षति हुई अभूत।इक ज़लज़ला आया

अपना एक घर- जितेन्द्र ‘कबीर’

December 10, 2021

अपना एक घर बहुत आलीशान न भी हो,मामूली-सी छत के नीचे होचाहे साधारण सा एक कमरा,घांस-फूस से बनी झोंपड़ी होअथवा

Leave a Comment