Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

Maa kavita by poonam udaychandra

 “माँ” आज देखा है चेहरा अपनी  माँ का मैंने।  उभरती लकीरों और आंखों का गहना।।  मुश्किल बड़ी रास्ते छोटे, उसका …


 “माँ”

Maa kavita by poonam udaychandra

आज देखा है चेहरा अपनी  माँ का मैंने। 

उभरती लकीरों और आंखों का गहना।। 

मुश्किल बड़ी रास्ते छोटे, उसका स्त्री होना। 

उसके खामोश होंठ और आंखों से कहना।। 

शून्य सी निहारती वो अपलक सी देखती वो।

उसके मन की गहराई मेरी बेचैनी का बढ़ना ।।

निष्ठुर सी हो गई है ये जताती है सबको वो। 

मगर अंदर ही अंदर किसी उम्मीद का पलना।। 

कभी बेबस लगती कभी गजब का आत्मविश्वास। 

उसके सूखे होंठों पर मिश्रित भाव उभरना।। 

वो लड़ रही थी कभी खुद से कभी जमाने से। 

वो चाहती थी अपनी मुट्ठी को सहेज कर रखना।। 

मैं कर रही थी कोशिश समझने की, मगर कैसे? 

उसकी पीढा़ बेचैन कर गई रूढ़िवादिता का गहना।। 

क्या तोड़ पाउंगीं समाज के खोखले रिवाजों को?

क्या देख पाउंगीं उसका कहकशाँ लगाकर हंसना? 

पूनम उदयचंद्रा , मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश )


Related Posts

कविता-हमें लोकतंत्र न्याय बंधुत्व की सामूहिक विरासत मिली/Loktantra par kavita

October 22, 2022

कविता-हमें लोकतंत्र न्याय बंधुत्व की सामूहिक विरासत मिली हम अत्यंत सौभाग्यशाली हैं हमारी किस्मत खुली अहिंसात्मक सोच सच्चे उपयोग की

प्रकाश पर्व दीपावली की बधाईयां/Deepawali par kavita

October 22, 2022

 कविता -प्रकाश पर्व दीपावली की बधाईयां प्रकाश पर्व दीपावली की बधाई  पारंपरिक हर्ष और उत्साह लेकर आई  राष्ट्रपति प्रधानमंत्री ने

इस धरा पर…. ” (कविता…)

October 19, 2022

नन्हीं कड़ी में…. आज की बात “इस धरा पर…. ” (कविता…) सूरज की पहली किरण से,जैसे जगमग होता ये संसार।दीपों

ये ना समझो पाठकों

October 19, 2022

अरे ! लोग कहते जख़्मी दिल जिसकावही तो दर्द-ए शायर/शायरा होता है।।ज़ख़्मी दिल रोए उसका ज़ार-ज़ार जबतब कलम का हर

धनतेरस के दिन मैंने अपनी मां को खोया

October 19, 2022

धनतेरस 2020 के दिन मैं अपनी मां के साथ बैठा था अचानक उसे साइलेंट अटैक आया और मेरी नजरों के

पता नहीं क्यों

October 17, 2022

कविता –पता नहीं क्यों मुझे घर का कोइ एक सख्श याद नहीं आता। मुझे याद आता है वो भाव, वो

PreviousNext

Leave a Comment