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Laghukatha dar ke aage jeet hai by gaytri shukla

डर के आगे जीत है रिमझिम के दसवें जन्मदिन पर उसे नाना – नानी की ओर से उपहार में सायकल …


डर के आगे जीत है

Laghukatha dar ke aage jeet hai by gaytri shukla

रिमझिम के दसवें जन्मदिन पर उसे नाना – नानी की ओर से उपहार में सायकल मिली । चमचमाती लाल सायकल जिसमें हैंडल के सामने छोटा सा बास्केट भी लगा । रिमझिम बहुत प्रसन्न थी बार – बार सायकल की घंटी बजाकर सभी को दिखा रही थी । दूसरे दिन से ही बड़े जोश के साथ सायकल चलाना सीखने का अभियान शुरू हो गया । पापा सायकल थामे पीछे-पीछे दौड़ते और रिमझिम सीट पर सवार होकर डगमगाते हुए सायकल चलाती ।उसे डर लगता पर सीखने का उत्साह भी था । अभी लगभग एक सप्ताह ही हुआ था कि रविवार के दिन रिमझिम बिना मम्मी – पापा को बताए अकेले ही सायकल चलाने निकल पड़ी । अभी मोड़ तक ही पहुँची थी कि सामने से आ रही बाइक और किनारे बैठी गाय को देखते ही उसका संतुलन बिगड़ने के कारण जमीन पर गिर पड़ी । उसे चोटें तो आई ही कोहनी की हड्डी भी टूट गई और प्लास्टर चढ़ गया । धीरे-धीरे सब ठीक हो गया सिवाय इसके कि अब रिमझिम के मन में सायकल को लेकर डर बैठ गया जो उसकी उम्र के साथ बढ़ता गया । मम्मी – पापा ने समझाने का बहुत प्रयास किया पर कोई लाभ नहीं हुआ ।
समय बीता अब रिमझिम स्वयं एक माँ थी । उसके चार साल के बेटे का शरीर बुखार से तप रहा था घर पर वह और उसकी सास थे ।सास खुद घुटनों के दर्द से परेशान रहती थीं । पति काम के सिलसिले में शहर से बाहर थे । उसने अपने फैमली डॉक्टर को फोन किया वे घर आने में असमर्थ थे पर पूरी जानकारी लेने के बाद कुछ दवाओं के नाम लिखकर मोबाइल पर मैसेज किए । अब इन्हे मेडिकल स्टोर्स से लाए कौन? जो सोसायटी से बहुत दूर है । घर के आँगन में खड़ी स्कूटी मुँह चिढ़ा रही थी ।
खैर आस – पड़ोस में विनती करके रिमझिम ने दवाएँ मँगवा तो ली पर अब तक शाम होने को आ रही थी । बच्चे की तकलीफ देखकर उसे महसूस हो रहा था काश …..मैंने अपने डर को जीत लिया होता ।

गायत्री बाजपेई शुक्ला


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